tag:blogger.com,1999:blog-177298962007-05-01T17:44:05.512-07:00एक भोजपुरीया जवान की डायरीDanilhttp://www.blogger.com/profile/08887917576493881664noreply@blogger.comBlogger19125tag:blogger.com,1999:blog-17729896.post-1142689907152409782006-03-16T15:50:00.000-08:002006-03-18T05:52:36.466-08:00समय वाकई बदलऽता. बताईं ना देखते देखते बुझाता जे होली भी गायब हो जाई गाँव से. पिछला साल गईल रहनी घरे होली मनावे - एतना निराशा भईल देख के हिसाब-किताब; एहसों तऽ साफ दिल टूट गईल.<br /><br />जरी से ही बाहर रहते-रहते आपना खतिरा तऽ अईसन कौनो बात नईखे. अरे हम अपना केतना बेर रहबे कईनी ? लेकिन एगो बात रहे जे आदमी याद रखे, सोच के मन करे वापस जाए के. जे भी पाच-सात बेर मौका मिलल हर बेर एक जिदंगी भर याद रहे वाला अनोखा अनुभव भईल. अब कौनो कुछो ना होखी. एह साल पूरा फागुन एको रात<br />फगुअई ना गईलख लोग गाँवे. पता चलल जे होली के दिन भी कौनो धुराबाजी ना भईल, केहु भांग पी के ना मताईल, कौनो किस्सा ना बनल, एको मंडली ना निकलल, जे कादो बूंदा-बांदी होत रहे. अरे फगुआ मे पानी से डर!!!! आधा दुनिया दूर ईहाँ दिल टूट गईल.<br /><br />लेकिन बात बा जे आदमी कोसो तऽ केकरा कोसो. जईसन हिसाब किताब बा गाँव से सब रस आ मस्ती वाला लोग तऽ धीरे-धीरे बाहर निकलल जाता तऽ परंपरा कहाँ से बाचल रही. सोचला पर दुख हो जाला लेकिन वस्तुस्थिती तऽ ईहे हवे जे एक बेर गाँव छोडला पर वापसी ना होखे. परदेश से लोग वापस आवत रही अपना देश में लेकिन शहर से गाँव मे पुनर्वास कहाँ भईल बा कईहो. अच्छा भगवती के कृपा से हम जाएम वापस कईहो...Danilhttp://www.blogger.com/profile/08887917576493881664noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-17729896.post-1141695729079666372006-03-06T17:39:00.000-08:002006-03-06T17:42:09.090-08:00चाचा बुश आ के चल गईले. खूब गारी सुनले आ खूब वाह-वाही भी लूटले. ऊ तऽआपन काम कईले आ खुशी-खुशी अपना घरे गईले लेकिन कुछ बेहूदा लोग उनका विरोधमे प्रदर्शन करत-करत आपना मे ही कटृम-कटाई कर लेहलख. जय प्रजातंत्र.प्रजा के पूरा अधिकार बा बेवकूफी करे के.<br /><br />देख के हँसी आ गईल लेकिन ई ससुरा काँम्यूनिष्टवा साला सब के बताईं तऽ.... जहिया देश बम फोड़लख तहिया विरोध कईले आ आजू देश के हथियार बचावे ला प्रर्दशन मारऽताड़े सन. हद हो गईल बा. एह साड़न से भी जादे खतरनाक बा केहू. सब कामरेडन के पकड़-पकड़ दू-दू सोटा चूतड़ पर लगावे के चाही. नमूना सन कहीं के. खैर, भौंकऽ सन. बुश के भी चाहत रहे थोड़ा गरमाईल प्रदर्शन. ना तऽ ओह बेहूदवा के भी बुझाए लागी जे ऊ वाकई दुनिया के नेता हवे. आदमी आ नेता - दूनो बहुत घटिया हवे लेकिन हमनीं के देश खतिरा बढिया ही कईले बा. अरेकेतना बम चाहीं देश बचावे ला... आठ गो बढले बा रिएक्टर बाचल... ओही मेसे निकलल बम केतना दिन ले सड़ी.<br /><br />हमार गाँवे आम के उपज बढिया होला. लईकाही से ही आदमी गरमी के ईंतजारी आम खतिरा करे. ईहवा के तऽ आम छुए के मन ना करे. खाटी पन-टिटोड़ मेक्सिकन आम में कहाँ मजा बा अपना ईहाँ के जर्दा आ सुकुल के. बुश साहब के अईला पर ईहो भईल. आशा बा जे एक-डेढ साल मे कुछ आपन तरिका के आम में चोभा मारे के मिली. लार टपकावत बईठल बानी तब ले.Danilhttp://www.blogger.com/profile/08887917576493881664noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-17729896.post-1141190700994271782006-02-28T21:00:00.000-08:002006-02-28T21:25:01.016-08:00अनुनाद जी के टिप्पणी देखनी २३ जनवरी के पोस्ट मे. बहुत बढिया सवाल<br />उठऽईले..<br /><br /><span style="font-style: italic;">'लेकिन रौरा जैसन जवान के रहते का इ सफल होखे पाई ?'.</span><br /><br /> बहुत शर्मिदंगी के साथ स्वीकार करे के पड़ऽता भाई जी जे हमनी जईसन जवान लोग<br />कुछ ना कर पईलख. आपन-आपन सहूलियत मुताबिक हमनी सब केहू मूस-दौड़ मे लागल<br />बानी आ बात बा जे एह चक्कर में व्यक्ित-विशेष अपना स्तर पर भले ही जे<br />कर ले, सामूहिक स्तर पर बदलाव के कौनो आशा भी बाकी ना रहे. हमनी के समाज<br />मे बुद्धी आ विद्या के कौनो कमी नईखे; आ आर्थिक स्तर पर भी हम आशावान<br />बानी जे समय सुधरी. लेकिन हमरा कौनो आशा नईखे जे हमनी के समाज कईहो<br />सुधरी. एक भी जबरदस्त प्रयास हम नईखी देखत मानसिकता बदले के. प्रजातंत्र<br />के त ई खूबी हवे जे हर नेता मे प्रजा झलकेला. बात तऽ सही ही बा जे चोरी,<br />चुहाडी, चापलूसी के बोलबाला बा अपना समाज मे आज आ एही समाज से नू हउए सन<br />- छीताड़ देवेले जबे मौका मिलेला.<br /><br />अब देखीं जे ई सब हवा मे बतकही से का उखडे़ वाला बा, काम चाहीं कुछ. जे<br />भी कबो बाहरा मे रहल बा, ओकरा बतावे के कौनो जरूरत ना होखे के चाही जे का<br />कमी बा हमनी के घरे. आ ईहे कमी के अहसास से ताकत ले लेवे आदमी तऽ केतना<br />कुछ हो जाई. बहुत जादे त्याग त ना हो पाई लेकिन लागल बानी फेर मे जे<br />केहुलेखा कुछ काम हो जाए आपन गाँव-जवार खतिरा. एक गाँव के भी मानसिकता<br />बदल देहेम तऽ जमाना जीत लेहेम. समय बदलता, जमाना भागता, देखीं भगवती के<br />कृपा से एक समय जरूर आई जब हमनी के भी माथा ऊठी आपन नेतवन पर; आज के हालत<br />तऽ वाकई बहुत गर्व देवे-वाला नईखे.Danilhttp://www.blogger.com/profile/08887917576493881664noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-17729896.post-1140565475913665642006-02-21T15:44:00.000-08:002006-02-21T15:44:35.923-08:00आज अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस हवे. सबके एह दिन के शुभकामना. शायद शुकुल जी कहले रहलन जे आपन भाषा छोड़ के दोसर भाषा के बढावल तऽ अईसन भईल जईसे आपन महतारी के छोड़ के पड़ोसी के सेवा कईल. बहुत पुरान सपना बा जे भोजपुरी मे एगो उपन्यास लिखेम. आज सपना ईहवा लिख देहनी तऽ आशा बा जे एकदिन किताब-वो लिखा जाई.Danilhttp://www.blogger.com/profile/08887917576493881664noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-17729896.post-1140135655011930852006-02-17T16:20:00.000-08:002006-02-17T20:51:26.166-08:00जिंदगी मे विरोधाभास के कमी ना रहल कहियो. बताईं ना लईकाही आदमी पहाड़ पे बितऽवलख तबो ऊँचाई से डर लागेला. ई साला बिन माथा-गोड़ी के डर से जिंदगी परेशान बा. गईल रहनी राँकी-माऊटेंन पर स्कीईगं करे एक बेर फेर. सोचले रहे आदमी जे अबकी त साफ डर निकाल देवे के बा. एकदमजी-जान लगा के चढत गईनी एक लिफ्ट से दोसरा लिफ्ट पर - शुरु कईनी बिगिनर्स से आ ईंटरमिडियट ले जात जात बुझा गईल जे ई साला एतनाआसानी सेजाए वाला मर्ज ना हवे. २५ बेर से जादे बईठला के बाद भी साला जईसे लिफ्टके ऊँचाई २०-२५ फुट से ऊपर होखे हमार होश गायब होखल शुरु हो जाए. केतनाकोशिश कईनी मन के समझावे के लेकिन ई साला डर कहा जाला. पहिले भी कई बारकोशिश कईले बानी लड़े के लेकिन अब बिश्वास हो गईल बा जे ईलाज करावे केपड़ी. जिदंगी मे गर आदमी एक बेर चिड़ई खानी उड़ के ना देखलख तऽ का मजाभईल जियला के.<br /><br />खैर, स्कीईंग तऽ जे भईल से भईल, मजा खूब आईल. बहुत दिन बाद मौका मिलल८-९ के ग्रुप मे बकवास करे के. जड़ीए से होस्टल मे रहला से आदत बिगड़गईल बा बडका-बडका ग्रुप मे ठठ्ठा करत आ अब वईसन जमात ना मिले त कबो-कबो कउचेला.<br /><br />आजकल ईटली मे विंटर ओलपिंक चलऽता. देखनी कुच दिन पहिले जे आपन भारत से भी४ जना पहुँच गईल बाड़े. देख के एक मिनट खतिरा खुशी भईल लेकिन फेर दिमागजरे लागल. बहुत निराश कईले बा ई आपन देश. दिन रात बाहरा मे आदमी एक मौकाखोजत रहेला जे ई फिरंगीयन के सामने एक बेर देश के नाम पर माथा उठ जाये.सौभाग्य के बात हवे जे पाकिस्तान चाहे बांग्लादेश मे जनम ना भईल.Danilhttp://www.blogger.com/profile/08887917576493881664noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-17729896.post-1138065469092553112006-01-23T16:30:00.000-08:002006-01-23T17:20:04.820-08:00<div><span style="font-family:Arial;"><span style="font-family:Times New Roman;">आज नेताजी के १०९वा जन्मदिन हवे. कुछ नेता रहले ऊहो. 'तुम मुझे खून दो, मैं </span><span style="font-family:Mangal;">तुम्हे आजादी दूँगा' के</span></span><span style="font-family:Times New Roman;"> नारा से हम भले ही पूरा मेल ना बैठाईं लेकिन कहे वाला मरद रहे से तऽ ना नकारेम. आपन समाज के हाल अईसन हो गईल बा जे हमनी के लगे बहुत कमी बा मरद हीरो लोग के. अब कारण जि भी होखो, वस्तुस्थिति तऽ ईहे हवे जे हमनी के अधिकतर महान लोग (आदमी, भगवान नाही)बाहुबल से दूर जाके ही महान बनल बा. दरिद्रनारायण के उपासक समाज के ईहे शायद सबसे बड़ा खूबी आ सबसे बड़ा त्रासदी भी रहल बा. गाँधी, बुद्ध, तुलसीदास के एह देश मे जहाँ अशोक तक के नाम युद्ध से दूर भागला खतिरा लेहल जाला, एक अगुआ भईल जे देश खतिरा लड़े के सोचलख आ लड़लख भी. गाँधी बाब जे करलन से करलन - आजादी देवऽईलन, कुछ हद ले समाज सुधारलन आ थोड़-बहुत एक दिशा भी प्रदान कईले; लेकिन कहियो बापू के नाम सुन के सीना ना चौड़ा होखे - ई एगो अईसन सम्मान बा जे हर भारतीय सुभाष बोस आ भगत सिंह जईसन खतिरा ही रखेला. तीन गो कमीशन बईठल आ केतना तीन-पाँच बतकही भईल लेकिन आज ले सरकारी तौर पे पता ना चलल जे नेताजी कब आ कईसे मुअले. भारत-रत्न के सम्मान मे भी दागे लागल रह गईल.<br /><br />खैर, हमरा ना उम्ंमीद बा जे अभी ले जीअत होखिहन. भगवान शांती दऽस वीर के आत्मा के. पुरनका नेता लोग के जन्मदिन आ पुण्यतिथी भी अपना मे एगो काम करबे करेला - याद देला देवेला जे एक समय ओईसनो रहे.आज के तऽ ई हाल बा जे, जौन काँग्रेस के एतना महान-महान लोग सींचलख ओकर अईसन हाल भईल बा जे का कहल जाओ. बताईं ना ई अधिवेशन चलता ससुरन के आ ई सब नेतवन सब मिल के एगो काल्ह के लवंडा के माला पहिनावऽ ताडे सन. बताईं जावाहर लाल के खानदान के बेटा हवे तऽ का ससुरा भगवान हो गईल. हद हो गईल साला बेशरमी आ चापलूसई के... जा हो जवाहर लाल... कईसन ई लड़ी लगईलऽ हो. ई साला हरामखोर मउगा नेतवन सब के देख के आपन मुड़ी कूच लेवे के मन करेला. साला हद हो गईल ई ता. जईहा चाचा केसरी के हटा के राजीव के मुसमात के सीदे अध्यक्ष बनऽईले तईहे माथा फोड़ लेहले रहनी हम तऽ; आज बुझाता जे थूक के डूबे के पड़ी.<br /></span></div>Danilhttp://www.blogger.com/profile/08887917576493881664noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-17729896.post-1136504888889074342006-01-05T15:47:00.000-08:002006-01-06T09:39:50.723-08:00कहल जाला जे अंत भला तऽ सब भला. बढिया से गुजर गईल साल. जाते-जाते नानी माँ के भी ले गईल. दू साल से जादे ईंतजार कईली बेचारी बिछौना पर, बिना सुध-बुध के, पडल. नानी माँ पुरानका जमींदारी मानसिकता के रहली आ नयका जमाना मे हमेशा कुछ ना कुछ से खिन्न रहस, भगवान के घरे जरूर थोड़ा चैन मिली. लईकाही में ही हम चल गईनी नानी संगे रहे आ ऊहाँ से सीधे होस्टल. आज जब सोचऽतानी तऽ बुझाता जे आपन महतारी से जादे नानी के किस्सा याद बा. हमनीं के खेलत-कूदत अगर गिर जाईं सन तऽ नानी पहिले चेहरा देखस आ अगर चेहरा पे बारह बाजल देखाई देवे तब तऽ धरती के दू-चार लात लागे, लेकिन अगर जे देह पे चोट के निशान आ आँख मे लोर के निशान ना मिले, तऽ डाँट, चाहे कबो-कबो दू थोपी भी, गिरे वाला के सहे के परे. ई बात कौनो तरिका से हमार ममेरी बहिन के मालूम हो गईल रहे आ पूरा लईकाही हम एह बात से खिसियाईल रहनी जे हमरे काहे डाँट परे, गुड्डी के काहे ना. आजन्म वैष्णव, नानी माँ कईहो प्याज लहसुन ले ना खईली, लेकिन जब ले उनका ताकत रहे चौका मे बाकी सब केहू के तरकारी खतिरा पिआज उनके हाथ से कतराईल. नानीमाँ के हाथ के लिट्टी, भंटा के चोखा, मकई के पिठ्ठी, मालपुआ, तरुआ, टमाटर के भरुआ तरकारी ईत्यादी खात बने.<br /><br />मात्र एक शिकायत रह गईल नानी से - बहुत बेकार नाम धर देहलू. बतावऽ तोहरा शायद अंदाजा ना रहे लेकिन कौनो बढिया, आसान नाम रहित त ई दोसर देश मे सब नाम के केवल पहिलका अक्षर से नानू बोलऽईतन सन. लेकिन जान लऽ जे तोहार देहल नाम हवे एही से ना बदलनी आज ले ना ही कईहो बदलेम, जिंदगी भर रह जायेम चिढत-कुढत. ईहो बात बा जे ई शपथ लिखाई के नाम पर लागू ना होखी - ऊ हमार आपन रही, माफ करिहा.<br /><br /><br /><div align="center">माता के भी माता रहलू,</div><div align="center">लेकिन सबसे जादे तू ही करलू-</div><div align="center">नाम देहलू, होश देखईलू,</div><div align="center">चले-रहे के भी सिखईलू.</div><div align="center">चलनी, रहनी, नाम बढईनी</div><div align="center">तोहार ऋण से उऋण ना भईनी.</div><div align="center">सादा जीवन, उच्च विचार,</div><div align="center">अपना से आगे आपन परिवार -<br /></div><div align="center">जबले जिएम हमहूँ चलेम</div><div align="center">देखावल कुछ रस्ता तोहार.</div>Danilhttp://www.blogger.com/profile/08887917576493881664noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-17729896.post-1134434517330676282005-12-12T16:41:00.000-08:002006-01-05T15:47:08.466-08:00एक जना बाड़ें टूकी विलियम करके एह दुनिया मे. टूकी भाई अपना समय मे गबरू जवान रहले आ जवानी के जोश मे लास एंजेलेस मे एगो गैंग शुरु कईले ६० के दशक के अंत मे - क्रिप्स नाम से. आज के दिन मे ई दुनिया के सबसे बड़का गैंग बाटे- उत्तरी अमेरिका से लेकर के दक्षिणी अमेरिका आ दक्षिण अफ्रिका ले हजारो शाखा बाटे क्रिप्स के आज.<br /><br />१९७९ के साले टूकी भाई पर चार गो खून के आरोप लागल आ मौत के सजा हो गईल. सजा लागला के बाद भी टूकी के आदत ना सुधरल आ एकाध बेर छूरी-चक्कू चलईले जेले मे, एक बेर फिरार होखे के भी कोशिश कईले लेकिन एको बेर आपन जुर्म ना सकारले.<br /><br />जेल के कोठरी मे अकेले बईठल-बईठल अंतऽतोगत्वा कुछ बुद्धि आईल कि मन ऊब गईल, टूकी जवान के विरक्ति हो गईल. गैंग खतिरा माफी माँगले आ लागले लिखे लईकन के किताब. पढल-लिखल कौनो खास त रहले ना जे पंचतंत्र लिखते, लिखे लागले गैंग के विरोध मे. कुछ किताब लिखले कुछ पेपर लिखले आ कुछ एहिंगे भाँगले; एगो आत्मकथा भी निकाल देहले. लेखन मे तऽ ससुरा के अईसन कौनो बात नईखे, बहुत ताव से लिखेला आ लंबा चौड़ा शब्द डालेला लेकिन बात बा जे ईहा अज्ञेय जी के जेलगमन के बात नईखे होत. एकाध बात लेकिन हमरो बहुत बढिया लागल - जईसे एक जगह लईकन के कहता जे अगर जेल के अनुभूति करे के होखे त मात्र दस घंटा ला अपना के गुसलखाना मे अकेले बंद कर के देखे के.<br /><br />खैर, धीरे-धीरे नाम फैलल आ एक साले एगो स्िवस नेता टूकी लाल के नाम नोबेल शांति पुरस्कार खतिरा भी डाल देहले. ओकरा बाद मे कम से कम पाँच बेर आऊरी नाम गईल ईनकर नोबेल खातिर, एक बेर साहित्य खतिरा भी; आ, एह बात से हमार जे ना सुलगे के चाही से सुलग जाला लेकिन टूकी बाबू के का दोश बा ओमे. समय आईल जे टूकी जेतना बड़ गैंग मे ना रहले ओकरा ले बड़ जेल मे हो गईले. एगो सिनेमा भी बनल हालीवुड मे. ग्रुप बन गईल जे ईनकर रिहाई के माँग करे लागल पहिले - कहनाम जे दोषी नईखे जवान; जे जूरी के लोग वर्ण-भेद कईलख; आ काथी काथी. सारा नियम-कानून आजमाईला के बाद लोग भिड़ल गवर्नर के लगे माफी खतिरा - जे जाए दीं, उमरकैद बना दीं, समय दीऽ नया सबूत मिलल बा त का का.<br /><br />बुझात रहे जे ई जोकरवा स्वार्जनेग्गरवा माफी दे दी, लेकिन कुछ दिन ले लोग सब के घुमईला के बाद आज मना कर देहलख.<br /><br />से बात ई हवे जे आज राती के टूकी पहलवान (ससुरा भिसंड बा देह दवासा से) के सुई देके मार देहल जाई.<br /><br />हम सजाए-मौत के पक्षधर त ना हईं लेकिन लोग के मरला जियला से हमरा अईसन कौनो असर भी ना होखे लेकिन टूकिया के मरत देख के बहुत अजीब लागऽता. बताई कईसन ओ दिमाग मे लागत होखी - मरला ले आशा बाँधले टूकी साले के पचास खून के सजा तऽ उँहे लाग गईल. साले के सही सजा मिलऽता कि गलत से ना तऽ हमरा कौनो फड़क पड़ी, ना ही कुछो उखड़ी. लेकिन, मान ली जे कही ई नईखे खून कईले. बीसन साल के आदमी के सुधार कोर्ट के एक गलती के नईखे धो सकत. बहुत डर लागेला हमरा. साला जेतना बढिया सिस्टम बा उहा ओतने बड़ खतरा बा. एक बेर कही कुछ फिसलल जे टाँय-टाँय फिस्स.Danilhttp://www.blogger.com/profile/08887917576493881664noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-17729896.post-1134001994402335442005-12-07T16:31:00.000-08:002005-12-07T16:42:34.526-08:00अपना ईलाका मे आदमी के नाम आदमी से आगे बढेला. कारण जे भी होखे - नामील आदमी के अभाव चाहे नामील आदमी से लगाव. लईकाही से एक नाम सुनत आईल आदमी -गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह के. जेतना सच ओकर दुगुना लबड़ई. हर दोसरा आदमी के लगे एगो थियोरी रहे उनका पर आ हमार विचार शुरु से कुछ अईसन रह गईल जे दुनिया के प्रति एक अलग तरह के अविश्वास हमेशा रहल.<br /><br />खैर समय बदलल आ पहुँच गईनी अमेरिका. बईठल बईठल एक दिन ईंटरनेट पर खोजनी वशिष्ठ बाबू के नाम तऽ ईहो विश्वास हो गईल जे अमेरिका से PhD कईले रहलन UC Berkley से. बहुत दिन ले खोजला पर उनकर एक पेपर भी मिलल जे Pacific Journal of Mathematics मे १९७४ मे प्रकाशित भईल रहे.<br /><br />"Reproducing kernels and operators with a cyclic vector. ( <a href="http://projecteuclid.org/Dienst/UI/1.0/Summarize/euclid.pjm/1102911984">http://projecteuclid.org/Dienst/UI/1.0/Summarize/euclid.pjm/1102911984</a>) " नाम से हमरा तऽ खैर कुछ खास ना चमकल लेकिन एक मित्र , जिन गणित मे PhD करत रहले, बतईले जे kernel functions के पढाई मे ई पेपर वाकई आपन स्थान रखेला. जेतना बतकही आदमी सुनले रहे सब पर विश्वास हो गईल जब एकाध साल पहिले Berkley के एगो जापानी विद्यार्थी आपन माथा पीट लेहलख जान के जे सनकल वशिष्ठ बाबू सड़ऽ ताड़े बिहार मे.<br /><br />आज Bhojpuria.com पर उनकर बोली सुनके याद आ गईल. गर्व तऽ जरूर होखेला लेकिन मलाल भी रहेला जे अईसन प्रतिभा सबकर सामने बिखर गईल आ लोग खाली बतिआवते रह गईल. राज्य से अभी एक किशोर बा जेकरा से आशा बा कुछ लमहर कर के दिखावे के. तथागत तुलसी के नाम त खैर लोग जानते बा काम देखी कहा ले करेला ऊ लईका. <a href="http://physics.iisc.ernet.in/~tathagat/main.htm">http://physics.iisc.ernet.in/~tathagat/main.htm</a> पर होमपेज हवे बालक के. बहुत ही सुशील आ विनम्र लईका बुझाता बतकही से. भगवान बचावस एह लईका के कौनो विघ्न- पीड़ा से. ले आव बबुओ नोबेल वगैरह कुछो. बहुत जरूरत बा एक दुनिया स्तर पर अव्वल बिहारी के.Danilhttp://www.blogger.com/profile/08887917576493881664noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-17729896.post-1133288110916503262005-11-29T17:00:00.000-08:002005-11-29T17:10:36.740-08:00शदाब भाई के टिप्पणी में आशावाद के बहुत सुंदर झलक दिखाई पड़ल. भाई, अगर राऊर सवाल हम सही समझनी तऽ बोलेम जे अगर ईहे चक्कर लागल रही तऽ देर हो जाई विकास भईला ले. कब ले जनता ई चोरवन सन के पाकिट भरत रही. बात तऽ सही ही बा जे जब लालू आईल रहले तब उनका से भी बहुत उम्मिद रहे; चलीं अब आशा कईल जाए जे नीतिश बेहूदा ना बनावस.<br /><br />आजकल अमरीकि राजनीति मे भी बहुत ऊथल-पुथल मचल बा. काका बुश के दिक्कत हो गईल बा - लड़ाई रुकते नईखे आ हेने उनकर पार्टी के नेता लोग घूस खा-खा के मोटा गईल बा लोग. ओमे हांलांकि बहुत आश्चर्य के बात तऽ नईखे, आश्चर्य के बात त ई बा जे काल्ह एगो नेतवा मार लोर टपका टपका सकारलख जे लाखो डालर घूस लेहले बा. बताईं अपना देश मे कबो होखी.लेकिन तब बात बा जे ई तुलना भी बराबर के नईखे; एह बात के ईंहे छोड़ल जाव.<br /><br />आजकल ईंहा के मौसम एतना मस्त भईल बा जे का कहल जाए. दक्षिणी कैलिफोर्निया के मौसम हमरा ख्याल मे दुनिया के सबसे अच्छा मौसम होखे के चाही. मैराथन के तैयारी चल रहल बा जोड़-शोर से. सोचले तऽ रहनी जे मार्च मे दौड़ लेहेम एगो लेकिन बुझाता जे कुछ समय और लागी. विचार बा जे जनवरी ले कम-से- कम आधा मैराथन दौड़ जाईल जाए. एक बेर दस माईल से जादे दूरी बढेला त़ शरीर मे अईसन अईसन जोड़ आ मसल के पता चलेला. जेतने छोट टुकड़ा होखी मसल के, साला ओतने दिक्कत करेला. आजकल हमरो एड़ी परेशान कईले बा- Achilles Tendonitis करके बोलेला.<br /><br />मैराथन के बात से याद आवता पटना के किस्सा. एहसों होली मे गईनी तऽ अखबार मे फोटो देखनी दौड़ाक लोग के कुर्सी-टेबल लेकार भागत. मैराथन शुरु भईला के तीन घंटा के भीतर सारा कुर्सी-टेबल गायब रहे आ शायद एक भी दौड़ाक दौड़ मे ना बाचल रहे -- <strong><span style="font-size:130%;">जय बिहार</span></strong>.Danilhttp://www.blogger.com/profile/08887917576493881664noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-17729896.post-1132714762304764342005-11-22T18:00:00.000-08:002005-11-23T09:02:26.466-08:00<div style="TEXT-ALIGN: center">अलविदा लालू<br /><br />पंद्रह साल ले बंबू कईलऽ;<br />जयप्रकाश के नाम डूबईलऽ;<br />जनता के टोपी पहिनईलऽ;<br />भेड़ बकरी के चारा खईलऽ;<br />कोर्ट मे लडलऽ भीतर भी गईलऽ;<br />मेहरारु के राज पकड़ईलऽ;<br />साड़न के रंगदार बनईलऽ;<br />घंटे खून, चौघंटे रेप आ छौ मे एक अपहरण करवईलऽ;<br />अराजकता के नंगा नाच नचवईलऽ;<br />त्राही-माम त्राही-माम मचवईलऽ.<br /><br />राज्य के फेर भाग जाग गईल;<br />संतन के भखौती आज लाग गईल;<br />सुदंर अब अतिसुदंर भईल;<br />सरदारवा के भी शाषण गईल.<br />आशा के किरण फेर झिलमिलाईल;<br />धनिकन के जान मे जान आईल;<br />डाकदरन के चेहरा चकचकाईल;<br />लईकन के दिल मे खुशी समाईल;<br />माहटरन के फेर उम्मिद भर आईल;<br />चुहाड़न के दिल कस के धकधकाईल.<br /><br />प्रजातंत्र के बलात्कारी,<br />जान ला तू यादव लल्लू -<br />हर कुकुर के दिन आवेला;<br />मौगो के भी लगन लागेला.<br />मसखरी करत कहँवा ले जईबऽ,<br />बिना नीति के राज भागेला.<br />केद्रं मे चंपई तेल लगावऽ;<br />मुसमात के जाघं के मैल छोड़ावऽ;<br />एक न एक दिन त जईबे करबऽ,<br />जेल मे तेल कड़वा लागेला.</div>Danilhttp://www.blogger.com/profile/08887917576493881664noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-17729896.post-1132013307907360552005-11-15T14:30:00.000-08:002005-11-15T14:21:49.146-08:00<div align="left">एक से एक नौटंकी होखेला अपना क्षेत्र मे भी. खबर पढनी जे जेल पर हमला हो गईल रूसी क्रांति के बरखी के सुअवसर पर. गरीब-गुरबा ले लेहले बारे सन ताकत हाथ मे. एकरा से खुशी के कौन बात होई जे कमजोर सन के ताकत मिल जाए लेकिन ताकत बहुत खतरनाक चीज हवे अपना आप मे. </div><div align="left"><br /> </div><em></em><div align="center"><em>ढोआए ना सबसे ताकत के बोझा; खेत खोदत अकलू राम चाहे कलम चलावत गोनू ओझा.</em> </div><div align="left"><br /><br />खेत खोदत-खोदत अकलू ससुर के बुझाईल जे खेत उनकर हो गईल आ ऊ पहुँच गईले झटकल बेकाम, बेकरम, बेवकूफ आ जींस- कुरता तानले नया-नया क्रांतिकारीयन के लगे; जींस वाला नेता के जनता के ताकत मिलल आ फटही पहिनले जनता के नेता के ताकत मिलल. मिल के दूनो बंदूक ले अईले सन आ सामाजिक न्याय के खेला शुरु हो गईल. एक तरफ कामचोरी आ अशिक्षा के अईसन आलम बा जे ससुर अकलू के बुद्धि-विद्या से कौनो मतलब नईखे; दूसरा तरफ प्रजातंत्र के अईसन छूट बा आ जिंदगी मे अईसन शून्य बा जे ई साले पढल-लिखल बैल ससुर लोग ईक्किसवीं सदी मे रूसी क्रांति के वर्षगाँठ मनावता. रे बेहूदा सन, जाके तनी रूस के हालत देखऽ सन रे. साला ओकरो से जादे नाकाम कौनो प्रयोग भईल होई कहियो. ई धंधा हो गईल बा साला लोग के. दिमाग से कौनो वास्ता नईखे आ ससुर लोग दिमाग लगावता आज.<br /><br />कैगो campus मे देखनी जे सबसे बेकार आ घूमल विचारधारा वाला सब communist बनेले सन. गरीबी खत्म करी ससुर लोग - देखऽ लोगिन नेपाल के हालत. जे चुतियन के बंदूक आ बम किने के पैसा बा आ चलावे खतिरा लोग बा, ओ कमीनन के दिमाग मे ई काहे ना घूसे जे ढंग से चलावल जाए त केतना कल्याण के काम होई ओह पैसा से. बताईं ना ई अईसन प्रजाति बा जे भिखारीयन के खुशहाली चाहऽता बिना पूंजीपति के सहयोग से. ..<br /></div><div align="center"><br /><em> धन सहेजल कौनो पाप नाही, अर्धम के कौनो साथ नाही</em></div><div align="center"><em>दरिद्र मे नारायण जरूर बसेले, लेकिन खलिया जमीन पर भात नाही</em></div><div align="center"><em>पेट भरी बुद्धि-विद्या से, घोड़ा दबावत हाथ नाही</em></div><div align="center"><em>ई पढ-लिख के मताईल साढँन से बचीहऽ, गुमराह बाडे़ सन, होशियार नाही.</em></div>Danilhttp://www.blogger.com/profile/08887917576493881664noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-17729896.post-1131318691761713612005-11-06T18:08:00.000-08:002005-11-06T20:10:52.656-08:00<p>अपना ईहाँ के समय से आज छठ के सांझिया घाट होई. छठ के त्योहार से हमार आपन कुछ खास लगाव नईखे रहल, कारण कि ढेर मौका नईखे मिलल मनावे के, लेकिन छठ के नाम से लईकाही के कुछ बहुत ही खास स्मृति ताजा हो जाला.<br />बहुत बचपन से ही हम ननीहाल मे रहनी. नानी के गांव चंपारण मे बूढी गंडक के किनारे बा. आ भादो ले आराम से बाढ के पानी पचा के डकार लेहला के बाद, आसिन-कातिक के त्योहारी सिलसिला के अंतिम कड़ी मे, जे नदी के शोभा लागेला छठ के बिहनईया घाट से त अभी ले दिमाग मे अंकित बा. जईहा देखनी आ जियनी उ मजा तईहा त ओतना होश ना रहे लेकिन ओह आँख से देखल कुछ-कुछ अभी भी एक मतलब दे देवेला - मातल आँखे नदी के कछार पर चलत पानी मे सूरुज के पहिला किरण के चमक से मन मे जे मस्ती उकसल रहे, शायद ऊहे श्रोत हवे अनगिनत रतजगा के गंगा से प्रशांत किनारे. भीड़ के हमार पहिला अनुभूति भी छठ के घाटे ही भईल बा. एकरा अलावे छठ के ही घाटे शायद हमार आदमी के सनक से भी पहिला परिचय हवे. याद आवेला लोग के साष्टाङ्ग रास्ता नापल, भखौती रखेला. एगो जवान, जे अभी ले बुढा गईल होईहे, के दिमाग मे चित्र घूमेला - बहुत श्रद्धा से हम जवान के फूटल केहुनी आ घुटना निहारले रहनी एक साले; आदमी के हर अजीबोगरीब सनक के प्रति एक विशेष appreciation के भी जड़ हम ऊँहे देखऽ तानी.<br />एह सब के अलावा छठ के ठेकुआ-टीकरी-कसाड़-पुआ भी याद पड़ऽता सोचऽतानी त. नानी के हाथ के बनावल मीट्ठा वाला ठेकुआ त अब खाली बाते मे रह जाई. बेचारी नानी अब का खीअईहन, २-३ साल से त यमराज के ईंतजारी मे बेचारी पड़ल बाड़िन. भेजऽ हो छठी मईया, भेजऽ यमदूतन के नानी घरे एह साल. केतना दुख सही बुढाईल शरीर.<br /></p>Danilhttp://www.blogger.com/profile/08887917576493881664noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-17729896.post-1130868685618465492005-11-01T10:30:00.000-08:002005-11-01T11:44:10.976-08:00दिअरी के शुभकामना सब केहू के. हमार आपन त का दिवाली आ का छठ. घर-परिवार आ मित्रगण के शुभकामना देके ही मन अघा जाला. बाकी ढेर कुछ मिलबो ना करी खोजलो पर.<br /><br />अगर हमार बात केहू माने त हम बोलेम जे सबकार कम से कम पाँच साल प्रवासी के जिंदगी जीए के चाही.दिवाली के दिया के Halloween के अंहार (Halloween के सांझे हमेशा घर के बत्ती बंद रखे के पड़ेला काहे कि हर साल भुला जानी लईकन खतिरा लेमनचूस खरीदे के)से आ तरुआ के जापानी तेमपुरा (Tempura) से बदले के मजा ही कुछ और हवे.<br /><br />एह दिवाली लक्ष्मी जी थोड़ा प्रसन्न नईखी बुझात. पिछले सप्ताह जुआखोरी के सबसे बड़ा अड्डा - लास वेगास - मे पाकिट कटा गईल. साला चोर-चुहार भी जगह के हिसाब से बदले ले सन. बेतिया-मोतिहारी मे कटाईल रहित त पईसा निकालते सन आ मस्त रहते सन; दिल्ली मे ढेर कौनो खिसीआईत त दू-चार जगह क्रेडिट कार्ड चलावे के कोशिश करते सन; लेकिन ई लास 'एकरी $%^ & #$*' वेगास हवे. पाकिटमार भी छँटल बारे सन. ७-८ घंटा मे ही पूरा बैंक के आ दू-दू गो क्रेडिट-कार्ड के एकाऊंट खाली. अईसन सफाई से काम भईल बा जे बैंक वाला जासूस लोग के बुझात ही नईखे जे का भईल. खैर,<br /><br />बाकी, ईहाँ लईकन के परिक्षा आवता SAT के आ आधा से जादे के कौनो अंदाज ही नईखे. अमरीकि स्कूल थोड़ा अलग तरिका से चलेले सन आ पढाई पर अपना ईहाँ अईसन जोर ना रहेला हाई स्कूल ले कम से कम. तीन महिना से जादे से बगल के एगो स्कूल मे SAT खतिरा गणित के क्लास पढावत बानी. पाँच दिन मे परिक्षा बा आ आज ले आधा से ज्यादा क्लास बिना कलम चाहे कागज के आवेला. गणित पढावल थोड़ा मुश्किल हो जाला जब तीन चौथाई के परिक्षा के नाम भी ठीक से मालूम ना होखे. एगो जवान बा - आन्हर मे काना राजा लेकिन जौना क्लास मे पाँच गो विद्यार्थी के ई नाम ना मालूम होखी, ई लईका नोबेल पुरस्कार जीते के ईच्छा रखेला. मेहनती हवे आ के जाने ला जीत भी सकऽता. सब सोच के खेल हवे. ई बहुत बड़ा अंतर देखेनी हेने के आ अपना ओरी के मानसिकता मे - लोग ईहाँ सोच पे लगाम ना लगावे कठिनाई के डर चाहे ख्याल से.<br /><br />अभी लागल होई जमावड़ा जुआ पर अपना ओरी , ठ्ठा लागत होई, गिलास भरात होई, तेल रगड़ के केतना लोग चोरी के कैरियर के शुरुआत करत होखी, बम पटाखा ताबड़-तोड़ फूटत होखी, बहुत मजा होखी.... अच्छा कहियो फेर हमरो मिली. हा हा पुरान प्रवासी चुटकुला हवे.Danilhttp://www.blogger.com/profile/08887917576493881664noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-17729896.post-1130626430321639292005-10-29T16:00:00.000-07:002005-10-30T15:34:25.220-08:00बताईं ना एह दुनिया मे अईसन भी लोग बा जे साफ ना बूझे कुछ. अईसन साला हालत हो गईल बा आदमियता के . एक अनदेखा, अनजाना अंत के नाम पर एतना घटिया माध्यम. सबसे जादे दिल कचोटेला ई बात जे ई सब मे शक्ति के श्रोत आपन परवरदिगार ससुर बारें. हमार माँ तऽ ई पोस्ट नाहिए पढियें, सुनावल जाव कुछ साले भगवान के. आदमी के कुछो कहल तऽ देवार पर माथा फोड़ल हवे.<br /><br /><div style="text-align: center;">देखऽ हो पैगंबर ई का भईल<br />का बतईलऽ तू एह कमीनन के<br />जे एह हद तक बात चल गईल.<br />अरे दिअरी के बाजारे फेर कैगो दिया बुतल<br />फेर केतना मन टूटल, फेर मानवता घायल भईल,<br />आ एक बेर फेर हमार विश्वास फूटल जे<br />आदमी के बनावल भगवान आदमियता के ना भईल.<br /><br />अरे ई कौन देवत्व भईल राम -<br />लौ के बदल देहलऽ लपट से,<br />पटाखा के बदले बम के भड़ाम.<br />बेकार शिक्षा देहला तू<br />देखऽ तऽ ई दहशत तमाम.<br />तोहरा बल पर, ई बेमतलब लड़ाई में<br />अईसन हिंजड़ा भईल ईंसान.</div>Danilhttp://www.blogger.com/profile/08887917576493881664noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-17729896.post-1130259258522844932005-10-26T12:50:00.000-07:002005-10-26T13:07:56.156-07:00<div align="left">प्रजा के तंत्र तऽ अईसन टूटल, राजनीति नौटंकी हो गईल बा. केतना सप्ताह से हम हे अखबार, हो अखबार मे खोजऽतानी जे एगो नेता कहीं कौनो मुद्दा के बात करे. कौनो ससुरा के मतलब नईखे, लेकिन बात बा जे हम कौन बड़का आंदोलन छेड़ले बानी अपना स्तर पर. हा एगो काव्य-प्रयास भईल हऽ. भोजपुरी मे दूसरा कविता हवे ई. </div><div align="left"></div><div align="center"></div><div align="center"></div><div align="center"></div><div align="center">दौड़ऽ हो भईया, दौड़ऽ हो चाचा<br />नेताजी अईलें.<br />नेताजी अईलें, सपना लईलें<br />ले अईलें वादों के हार.<br />हाथ जोड़िहें, मीठ बोलिहें<br />कहिहें सबकर मन के बात.<br /><br />"सुन लऽ भईया, सुन लऽ बहिनी, सुन लऽ खोल के कान -<br />गईया भैंसी बैल बकरिया, बेढी कोला राम मडै़या, बीड़ी खैनी पान<br />चोरी-चुहाड़ी मारामारी, पट्टीदार के पट्टीदारी, खेत चाहे खलिहान. </div><div align="center">बिना झिझक के दुख बतला दऽ; आपन मुश्िकल नोट करा दऽ. </div><div align="center">नोट करा के स्िलप ले ली हऽ; भोट के दिन ले सजग से रहि हऽ. </div><div align="center">ऊँख चूस के पानी मत पी हऽ; देख दाख के सड़क पर चलिहऽ. </div><div align="center"><em>अरे हेने ना सुनऽ हो बुढऊ, तू केने अईँकताड़ऽ पहलवान </em></div><div align="center"><em>मेहरारु लोग सुनऽ तारू ना आ तू का करऽताड़ऽ जवान</em> </div><div align="center">सोच समझ के भोट गिरईहऽ समय आज के बहुत अलग बा, </div><div align="center">विकास प्रकाश तऽ बहुत सही बा, लेकिन मुद्दा ऊहे नाही बा. </div><div align="center">प्रजातंत्र में, जान लऽ बाबू, केवल बहुमत के बतकही बा. </div><div align="center">अब पूछबऽ तू हमरा से जे काहे,रोड के सोलिंग ना भईल बा ?<br />हम बोलेम जे जनता के गलती, हमरा मे ईहाँ कौन कमी बा.<br />जबले ना मिली पार्टी के बहुमत हमरा हाथ मे कुछ नाही बा.</div><div align="center"><em>नोट करऽ हो विद्यार्थी , आ तनी माईकवा तेज करऽ हो रहमान</em></div><div align="center">प्रजातंत्र मे बहु के राज, एक के मतलब कुछ नाही बा.</div><div align="center">का तू करबऽ से ना राजा, बाकी मे तोहार भाग धईल बा.</div><div align="center">तोहनी के सेवक हम हरदम करेम तोहनी के भला के बात</div><div align="center">तू ढेर खिसिअईबऽ तऽ ईहाँ से चुनबऽ कौनो बादुड़ छाप.</div><div align="center">लेकिन ई जान लऽ सब लोगिन, हम कह देतानी साफ-साफ;</div><div align="center">पूरा प्रदेश मे हवा बहऽता, बहुत ही जोर शोर से आज -</div><div align="center"><span style="font-size:180%;"><strong>अबकी बार डिब्बा सरकार</strong></span></div><div align="center">डिब्बे के होई राज जान लऽ चली आवऽ हमरे साथ</div><div align="center">डिब्बा पर गिरईबऽ या पछतईबऽ - फैसला बा तोहरे हाथ."</div>Danilhttp://www.blogger.com/profile/08887917576493881664noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-17729896.post-1129566798860290302005-10-17T11:00:00.000-07:002005-10-17T21:27:40.526-07:00आजकल स्िथति कुछ अईसन भईल बा जे दुनिया में बहुत कुछ उल्टा-पुल्टा चल रहल बा. बताईं ना, वेटिकन शहर में ओझौति के पढाई शुरु भईल बा. पादरी लोग चोगा पहिन के शैतान पकडे़ के कला सिखऽताडे आ ईहाँ शैतान लंगटे नाचऽता बीच बाजारे.<br /><br />काका बुश कुछ दिन पहिले फिलिस्तीनी अब्बास मस्तान के बतईलें जे उनका भगवान से संपर्क हो गईल बा. अब्बास लाल के रोकड़ा के जरूरत आ ईजरायली बंबू से बचाव चाहत रहे से ऊहो का बोलतन लेकिन दू थोपि लगावे के चाहत रहे. खाली लबड़ई के बाजार लगईले बा ससुरा. हम कहऽतानी जे रे लबड़ा अगर तें सही में भगवान से संपर्क बना लेले बारिस् तऽ आज ई तोहरा देश में ईवोल्यूशन आ क्रियेशन के का बतकहि होता? कचहरी बताई लईकन के अब जे वैज्ञानिक आ ग्रंथ में से कौन सांच बा!!<br /><br />अब दोसरा के लबड़ई पर का हँसल जाए, ईहाँ तऽ आपन पतलून में ही बड़का-बड़का छेद बा. चुनावी माहौल गरमाईल बा अपना ईलाका मे आ नेतवन सब लागल होईहन सन जनता के ऊल्लू बनावे मे. यादव लल्लू,राम विलास आ नितिश के दंगल में जनता एक बेर फेर माटी फांकी. लेकिन का अफसोस कईल जाए; जनता में से जनार्दन तऽ कहिए निकल गईले. चोर आ चुहार जनता एक बेर फेर चोरन आ चुहारन के चुनिहें सन; आ एक बेर फेर से हम दूर से तमाशा देखेम आ बाकि सब केहू के गरिआयेम.<br /><br />कोशिश करेनी जे जादे ना सोचीं एह सब विषय मे लेकिन का करीं, दिमाग भटक जाला. आजकल एतना समय बा काम पर कि दिमाग के व्यस्त रखल मुश्किल हो जाता; आ खाली रखला मे डर हो जाता वेटिकन से लौटत पादरीया सन से - हमार शैतानी अड्डा न ऊजाडे़ लागऽ सन.Danilhttp://www.blogger.com/profile/08887917576493881664noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-17729896.post-1129143463594731382005-10-13T10:30:00.000-07:002005-10-13T16:18:44.250-07:00आसिन आ कातिक के महिना भोजपुरी-भाषी क्षेत्र मे आपन खास महत्व रखेला. नवरात्री के नौ दिन ले देवि के पूजा पाठ से अघा के दसवाँ दिन रावण के जरा के मरद-मेहरारू आ लईका लोग बीस दिन मे घर के साफ-सफाई लिपाई-पुताई कर के अमावस के राते पटाखा भड़का के छौ दिन मे ठेकुआ-टिकरी-पुआ पका सूरुज भगवान के डूबते आ उगते गोर लाग के ही आराम करेला. गाँव के मजा तऽ आसिन-कातिक चाहे फागुन मे ही बा. ना ढेर गरमी ना ढेर सरदी आ जबरदस्त मस्ती.<br /><br />काल्ह घरे बात करत रहनी तऽ पता चलल जे एह साल भी रामलीला चलल रहे गाँव मे. गँवई रामलीला अपना मे रंगमंच के एक विशेष विधि हवे. भगवान राम के कहानी कौन बुढिया आ कौन लईका ना जानेला, ई तऽ तमाशा वाला मजा बा जे रामानंद सागर जी के नाटक मे ना मिली.<br /><br />४-५ साल पहिले एक बेर मौका मिलल रहे दशहरा के समय घरे जाए के. खेला भी भईल आ बहुत रुचि से हम देखनि भी. मजा भी आईल. एगो मजेदार जोकर रहे मंडली मे - ससुरा कबो मंथरा बने तऽ कबो सुग्रीव आ रेघा रेघा बोले. एगो लवंडा भी रहे जे नकिया-नकिया आरती गावे रोज खेला शुरु होखे से पहिले आ सीता माता के रोल भी खेले. संतोष चौधुर के मुताबिक नवल बाबु के आँख रहे ओकरा पड़. संतोष चौधुर के बात मे केतना दम रहे से केहु ना जान पाई; खेला शुरु भईला के एक सप्ताह के भीतर ही लवंडा साहेब जोखु महतो के छोटकी लडकी के साथे निपाता हो गईलेन. ई काम हमरा अनुपस्िथति मे भईल; हम कुछ दिन खतिरा ममहर आ बहिनौरा मुरगा तोड़त रहनि. घूम-घाम के घरे अईनी तऽ, अनभिज्ञ, हम फेर गईनी रामलीला देखे. वोह दिन के नाटक रहे अशोक-वाटिका मे सीता - हनुमान मिलाप. सीता जी घोघ तान के बईठल रहली रावण के बगईचा मे आ हनुमान जी अईले. हनुमान जी बोलले 'माता' तऽ सीता जी चुप. सब देखनिहार लोग के बुझा गईल जे पीछे से बोलल जाता ' तुम कौन हो, वत्स' बोले के, लेकिन ई नयका सीता जी खिसिया गईली- एकाएक देखऽतानी जे घोघ फेक के जोकरवा रेघावता -<br /><br />'का बकरी खानी मिमियाताडऽ, साफ-साफ बोलत काहे नईखऽ. लाँड पे पादी ई लवंडई, हमरा से ई घोघ तानल ना जाई'<br /><br />हँसते-हँसते हमार पेट दुखाए लागल. रामलीला के मैनेजर साहब जल्दी से परदा गिरईलन लेकिन जोकरवा तऽ पाउच मारले रहे. परदा के खींच के हटईलख आ लागल दौड़े. जब ले लोग पकड़े, लंका दहन ला तैयार कईल मशाल ओकरा हाथ मे आ गईल रहे. अभी याद करला पर एतना हँसी आवता तऽ सोचीं कईसन भईल होई जब साड़ी पहिनले, घोड़ा खानि हुड़कत जोकरवा पुअरा के लंका मे आग लगईलख. मंदिर मे खेला होत रहे आ सड़क के पार स्कूल मे लंका बनल रहे. आग के लपट के ओज मे गाँव भर के लोग सड़क के एह पार से जोकर भाई के हाथ मे मशाल चमकावत चुपचाप देखलख आ मैनेजर साहेब आपन माथा पकड के पीछे मे बहिन-महतारी कईलन. पता चलल जे उनकर ही सुझाव रहे जोकर लाल के पाउच पकड़ावे के - का दो झिझक भागी.<br /><br />रामलीला त़ऽ खैर डूबबे कईल, हम एगो सबक जरूर सिखनी -<br /><br />अगर मसखरा के मेहरारु बनाई तऽ कम-से-कम पाऊच ना पकड़ाई.Danilhttp://www.blogger.com/profile/08887917576493881664noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-17729896.post-1129053726616303402005-10-11T17:00:00.000-07:002005-10-11T20:21:44.746-07:00कुलदेवता सोखा बाबा के कृपा से आज इहो काम भइल - टाइमपास कहीं चाहे 'पास में बहुत टाइम'. जमाना बहुत तेजी से आगे भाग रहल बा. नया नया किसिम के तौर तरिका देखले देखले पुरान हो जाता. कुकुर बिलाई खानी दिन रात चूसल हड्डी के पीछे भागत भागत दुनिया परेशान बा -जवान जवानी मे आ बुढऊ लोग दलानी मे. बड़ा दिक्कत बा.<br /><br />लेकिन, हम आज एक कदम पीछे मारऽ तानी, भगौती के कृपा से. मोटा-मोटी पचीस साल पहिले, बसंत-पंचमी के दिन से, भट्टा छूके अभी ले लाखों लाईन लिखले होखेम हेने होने के भाषा मे; आपन मातृभाषा ने आज पहिला प्रयास बा. पचीस साल से जादे लाग गईल भाषा आ लिपि के मेल करावे मे. देर आयद दुरुस्त आयद. सरस्वती जी गवाह बाड़िन जे सब लक्ष्मी जी के खातिर भईल.<br /><br />सरस्वती पूजा के परसादी ता अब कहिया मिलि कहिया ना राम जाने लेकिन देवि पर ध्यान पूरा बा. हाऽ, सरस्वती पूजा के बात से एगो किस्सा याद पड़ऽता -<br /><br />नानाजी के छड़की के बाहर लईकन सब चंदा मांगत रहले सन. हम, सात -आठ साल के छवाड़िक, कोना मे खड़ा होके तामाशा देखत रहनी. एगो मास्टर-साहेब रोकईलें; मोटरसाइकल रोकलें आ तनि ताव से हिंदी में बोललें -<br /><br />'हमारे सवाल का जबाब दोगे तुमलोग तभी चंदा मिलेगा.'<br /><br />लईकन सब सोचते रहले सन जे पीछे वाला मास्टर-साहेब तड़ाक से पूछऽताड़े -<br /><br />'If अगर But लेकिन What माने क्या'<br /><br />अब बात रहे जे भले हि चंपारण के ऊ गाँव मे ई सबकर ना मालूम रहे, हमार होस्टलिया दिमाग मे ता ऊत्तर सेट रहे.<br />फटाक से कहनी -<br /><br />'पूछनेवाला गदहा तो बताऊँ मैं क्या.'<br /><br />मास्टर-साहेब के ता काटऽ ता खून ना. खिसिया के लागलन नाम पता पूछे. जब दू-चार गो मुँहफटवा बकले सन जे हम बहुत दूर पहाड़ पर पहाड़ा पढेनी ता मास्टर-साहेब अंग्रेजी मे शुरु हो गईले. नया-नया खून रहे आ हम कहाँ से कम रहनी - लाग गयनी जी-जान से हमहू. लईकवन सब खिखियाए लगलन सन आ माहटरन के मामिला तनि डोले लागल. हमहू जे पकड़नी रफ्तार तऽ रूके के नामे ना. अब का बोलनि आ कईसे बोलनी से ता नईखे याद, लेकिन मोटर-साइकल पर आगे वाला मास्टर-साहेब जे बात बोललन से आज ले याद बा -<br /><br />'बबुओ, केतनो चिडई ऊडस आकाश, फेर अईंहे धरती के पास.'<br /><br />आगे कहले जे,<br />'सब अंग्रेजी के टिटिर-बिटिर रह जाई धईल जे आपन समाज के तरिका ना आईल.'<br /><br />बोले वाला सज्जन मास्टर रहबो कईले कि ना से नईखी कह सकत, वाकई बुद्धी देत रहले कि एहिंगे लाज पचावत रहले -से भी नईखी बोल सकत लेकिन ऊ 'मास्टर' सज्जन के बात अभी ले दिमाग में बा.<br /><br />जान ला हो मास्टर-साहेब, ई डायरी तोहार मुखारविंद से मोटा-मोटी बीस-बाईस साल पहिले निकलल खखार के नाम करऽतानी. कौनो टिटिर-बिटिर ना होई अंग्रेजी मे ईहाँ.Danilhttp://www.blogger.com/profile/08887917576493881664noreply@blogger.com