समय वाकई बदलऽता. बताईं ना देखते देखते बुझाता जे होली भी गायब हो जाई गाँव से. पिछला साल गईल रहनी घरे होली मनावे - एतना निराशा भईल देख के हिसाब-किताब; एहसों तऽ साफ दिल टूट गईल.
जरी से ही बाहर रहते-रहते आपना खतिरा तऽ अईसन कौनो बात नईखे. अरे हम अपना केतना बेर रहबे कईनी ? लेकिन एगो बात रहे जे आदमी याद रखे, सोच के मन करे वापस जाए के. जे भी पाच-सात बेर मौका मिलल हर बेर एक जिदंगी भर याद रहे वाला अनोखा अनुभव भईल. अब कौनो कुछो ना होखी. एह साल पूरा फागुन एको रात
फगुअई ना गईलख लोग गाँवे. पता चलल जे होली के दिन भी कौनो धुराबाजी ना भईल, केहु भांग पी के ना मताईल, कौनो किस्सा ना बनल, एको मंडली ना निकलल, जे कादो बूंदा-बांदी होत रहे. अरे फगुआ मे पानी से डर!!!! आधा दुनिया दूर ईहाँ दिल टूट गईल.
लेकिन बात बा जे आदमी कोसो तऽ केकरा कोसो. जईसन हिसाब किताब बा गाँव से सब रस आ मस्ती वाला लोग तऽ धीरे-धीरे बाहर निकलल जाता तऽ परंपरा कहाँ से बाचल रही. सोचला पर दुख हो जाला लेकिन वस्तुस्थिती तऽ ईहे हवे जे एक बेर गाँव छोडला पर वापसी ना होखे. परदेश से लोग वापस आवत रही अपना देश में लेकिन शहर से गाँव मे पुनर्वास कहाँ भईल बा कईहो. अच्छा भगवती के कृपा से हम जाएम वापस कईहो...