एक भोजपुरीया जवान की डायरी

ऊहाँ से ईहाँ तक के किस्‍सा कहानी

Monday, March 06, 2006

 
चाचा बुश आ के चल गईले. खूब गारी सुनले आ खूब वाह-वाही भी लूटले. ऊ तऽआपन काम कईले आ खुशी-खुशी अपना घरे गईले लेकिन कुछ बेहूदा लोग उनका विरोधमे प्रदर्शन करत-करत आपना मे ही कटृम-कटाई कर लेहलख. जय प्रजातंत्र.प्रजा के पूरा अधिकार बा बेवकूफी करे के.

देख के हँसी आ गईल लेकिन ई ससुरा काँम्‍यूनिष्‍टवा साला सब के बताईं तऽ.... जहिया देश बम फोड़लख तहिया विरोध कईले आ आजू देश के हथियार बचावे ला प्रर्दशन मारऽताड़े सन. हद हो गईल बा. एह साड़न से भी जादे खतरनाक बा केहू. सब कामरेडन के पकड़-पकड़ दू-दू सोटा चूतड़ पर लगावे के चाही. नमूना सन कहीं के. खैर, भौंकऽ सन. बुश के भी चाहत रहे थोड़ा गरमाईल प्रदर्शन. ना तऽ ओह बेहूदवा के भी बुझाए लागी जे ऊ वाकई दुनिया के नेता हवे. आदमी आ नेता - दूनो बहुत घटिया हवे लेकिन हमनीं के देश खतिरा बढिया ही कईले बा. अरेकेतना बम चाहीं देश बचावे ला... आठ गो बढले बा रिएक्‍टर बाचल... ओही मेसे निकलल बम केतना दिन ले सड़ी.

हमार गाँवे आम के उपज बढिया होला. लईकाही से ही आदमी गरमी के ईंतजारी आम खतिरा करे. ईहवा के तऽ आम छुए के मन ना करे. खाटी पन-टिटोड़ मेक्‍सिकन आम में कहाँ मजा बा अपना ईहाँ के जर्दा आ सुकुल के. बुश साहब के अईला पर ईहो भईल. आशा बा जे एक-डेढ साल मे कुछ आपन तरिका के आम में चोभा मारे के मिली. लार टपकावत बईठल बानी तब ले.

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