एक भोजपुरीया जवान की डायरी

ऊहाँ से ईहाँ तक के किस्‍सा कहानी

Thursday, March 16, 2006

 
समय वाकई बदलऽता. बताईं ना देखते देखते बुझाता जे होली भी गायब हो जाई गाँव से. पिछला साल गईल रहनी घरे होली मनावे - एतना निराशा भईल देख के हिसाब-किताब; एहसों तऽ साफ दिल टूट गईल.

जरी से ही बाहर रहते-रहते आपना खतिरा तऽ अईसन कौनो बात नईखे. अरे हम अपना केतना बेर रहबे कईनी ? लेकिन एगो बात रहे जे आदमी याद रखे, सोच के मन करे वापस जाए के. जे भी पाच-सात बेर मौका मिलल हर बेर एक जिदंगी भर याद रहे वाला अनोखा अनुभव भईल. अब कौनो कुछो ना होखी. एह साल पूरा फागुन एको रात
फगुअई ना गईलख लोग गाँवे. पता चलल जे होली के दिन भी कौनो धुराबाजी ना भईल, केहु भांग पी के ना मताईल, कौनो किस्सा ना बनल, एको मंडली ना निकलल, जे कादो बूंदा-बांदी होत रहे. अरे फगुआ मे पानी से डर!!!! आधा दुनिया दूर ईहाँ दिल टूट गईल.

लेकिन बात बा जे आदमी कोसो तऽ केकरा कोसो. जईसन हिसाब किताब बा गाँव से सब रस आ मस्ती वाला लोग तऽ धीरे-धीरे बाहर निकलल जाता तऽ परंपरा कहाँ से बाचल रही. सोचला पर दुख हो जाला लेकिन वस्तुस्थिती तऽ ईहे हवे जे एक बेर गाँव छोडला पर वापसी ना होखे. परदेश से लोग वापस आवत रही अपना देश में लेकिन शहर से गाँव मे पुनर्वास कहाँ भईल बा कईहो. अच्छा भगवती के कृपा से हम जाएम वापस कईहो...

Monday, March 06, 2006

 
चाचा बुश आ के चल गईले. खूब गारी सुनले आ खूब वाह-वाही भी लूटले. ऊ तऽआपन काम कईले आ खुशी-खुशी अपना घरे गईले लेकिन कुछ बेहूदा लोग उनका विरोधमे प्रदर्शन करत-करत आपना मे ही कटृम-कटाई कर लेहलख. जय प्रजातंत्र.प्रजा के पूरा अधिकार बा बेवकूफी करे के.

देख के हँसी आ गईल लेकिन ई ससुरा काँम्‍यूनिष्‍टवा साला सब के बताईं तऽ.... जहिया देश बम फोड़लख तहिया विरोध कईले आ आजू देश के हथियार बचावे ला प्रर्दशन मारऽताड़े सन. हद हो गईल बा. एह साड़न से भी जादे खतरनाक बा केहू. सब कामरेडन के पकड़-पकड़ दू-दू सोटा चूतड़ पर लगावे के चाही. नमूना सन कहीं के. खैर, भौंकऽ सन. बुश के भी चाहत रहे थोड़ा गरमाईल प्रदर्शन. ना तऽ ओह बेहूदवा के भी बुझाए लागी जे ऊ वाकई दुनिया के नेता हवे. आदमी आ नेता - दूनो बहुत घटिया हवे लेकिन हमनीं के देश खतिरा बढिया ही कईले बा. अरेकेतना बम चाहीं देश बचावे ला... आठ गो बढले बा रिएक्‍टर बाचल... ओही मेसे निकलल बम केतना दिन ले सड़ी.

हमार गाँवे आम के उपज बढिया होला. लईकाही से ही आदमी गरमी के ईंतजारी आम खतिरा करे. ईहवा के तऽ आम छुए के मन ना करे. खाटी पन-टिटोड़ मेक्‍सिकन आम में कहाँ मजा बा अपना ईहाँ के जर्दा आ सुकुल के. बुश साहब के अईला पर ईहो भईल. आशा बा जे एक-डेढ साल मे कुछ आपन तरिका के आम में चोभा मारे के मिली. लार टपकावत बईठल बानी तब ले.

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