अनुनाद जी के टिप्पणी देखनी २३ जनवरी के पोस्ट मे. बहुत बढिया सवाल
उठऽईले..
'लेकिन रौरा जैसन जवान के रहते का इ सफल होखे पाई ?'. बहुत शर्मिदंगी के साथ स्वीकार करे के पड़ऽता भाई जी जे हमनी जईसन जवान लोग
कुछ ना कर पईलख. आपन-आपन सहूलियत मुताबिक हमनी सब केहू मूस-दौड़ मे लागल
बानी आ बात बा जे एह चक्कर में व्यक्ित-विशेष अपना स्तर पर भले ही जे
कर ले, सामूहिक स्तर पर बदलाव के कौनो आशा भी बाकी ना रहे. हमनी के समाज
मे बुद्धी आ विद्या के कौनो कमी नईखे; आ आर्थिक स्तर पर भी हम आशावान
बानी जे समय सुधरी. लेकिन हमरा कौनो आशा नईखे जे हमनी के समाज कईहो
सुधरी. एक भी जबरदस्त प्रयास हम नईखी देखत मानसिकता बदले के. प्रजातंत्र
के त ई खूबी हवे जे हर नेता मे प्रजा झलकेला. बात तऽ सही ही बा जे चोरी,
चुहाडी, चापलूसी के बोलबाला बा अपना समाज मे आज आ एही समाज से नू हउए सन
- छीताड़ देवेले जबे मौका मिलेला.
अब देखीं जे ई सब हवा मे बतकही से का उखडे़ वाला बा, काम चाहीं कुछ. जे
भी कबो बाहरा मे रहल बा, ओकरा बतावे के कौनो जरूरत ना होखे के चाही जे का
कमी बा हमनी के घरे. आ ईहे कमी के अहसास से ताकत ले लेवे आदमी तऽ केतना
कुछ हो जाई. बहुत जादे त्याग त ना हो पाई लेकिन लागल बानी फेर मे जे
केहुलेखा कुछ काम हो जाए आपन गाँव-जवार खतिरा. एक गाँव के भी मानसिकता
बदल देहेम तऽ जमाना जीत लेहेम. समय बदलता, जमाना भागता, देखीं भगवती के
कृपा से एक समय जरूर आई जब हमनी के भी माथा ऊठी आपन नेतवन पर; आज के हालत
तऽ वाकई बहुत गर्व देवे-वाला नईखे.