एक भोजपुरीया जवान की डायरी

ऊहाँ से ईहाँ तक के किस्‍सा कहानी

Tuesday, February 28, 2006

 
अनुनाद जी के टिप्पणी देखनी २३ जनवरी के पोस्ट मे. बहुत बढिया सवाल
उठऽईले..

'लेकिन रौरा जैसन जवान के रहते का इ सफल होखे पाई ?'.

बहुत शर्मिदंगी के साथ स्वीकार करे के पड़ऽता भाई जी जे हमनी जईसन जवान लोग
कुछ ना कर पईलख. आपन-आपन सहूलियत मुताबिक हमनी सब केहू मूस-दौड़ मे लागल
बानी आ बात बा जे एह चक्कर में व्यक्ित-विशेष अपना स्तर पर भले ही जे
कर ले, सामूहिक स्तर पर बदलाव के कौनो आशा भी बाकी ना रहे. हमनी के समाज
मे बुद्धी आ विद्या के कौनो कमी नईखे; आ आर्थिक स्तर पर भी हम आशावान
बानी जे समय सुधरी. लेकिन हमरा कौनो आशा नईखे जे हमनी के समाज कईहो
सुधरी. एक भी जबरदस्त प्रयास हम नईखी देखत मानसिकता बदले के. प्रजातंत्र
के त ई खूबी हवे जे हर नेता मे प्रजा झलकेला. बात तऽ सही ही बा जे चोरी,
चुहाडी, चापलूसी के बोलबाला बा अपना समाज मे आज आ एही समाज से नू हउए सन
- छीताड़ देवेले जबे मौका मिलेला.

अब देखीं जे ई सब हवा मे बतकही से का उखडे़ वाला बा, काम चाहीं कुछ. जे
भी कबो बाहरा मे रहल बा, ओकरा बतावे के कौनो जरूरत ना होखे के चाही जे का
कमी बा हमनी के घरे. आ ईहे कमी के अहसास से ताकत ले लेवे आदमी तऽ केतना
कुछ हो जाई. बहुत जादे त्याग त ना हो पाई लेकिन लागल बानी फेर मे जे
केहुलेखा कुछ काम हो जाए आपन गाँव-जवार खतिरा. एक गाँव के भी मानसिकता
बदल देहेम तऽ जमाना जीत लेहेम. समय बदलता, जमाना भागता, देखीं भगवती के
कृपा से एक समय जरूर आई जब हमनी के भी माथा ऊठी आपन नेतवन पर; आज के हालत
तऽ वाकई बहुत गर्व देवे-वाला नईखे.

Tuesday, February 21, 2006

 
आज अंतर्राष्‍ट्रीय मातृभाषा दिवस हवे. सबके एह दिन के शुभकामना. शायद शुकुल जी कहले रहलन जे आपन भाषा छोड़ के दोसर भाषा के बढावल तऽ अईसन भईल जईसे आपन महतारी के छोड़ के पड़ोसी के सेवा कईल. बहुत पुरान सपना बा जे भोजपुरी मे एगो उपन्‍यास लिखेम. आज सपना ईहवा लिख देहनी तऽ आशा बा जे एकदिन किताब-वो लिखा जाई.

Friday, February 17, 2006

 
जिंदगी मे विरोधाभास के कमी ना रहल कहियो. बताईं ना लईकाही आदमी पहाड़ पे बितऽवलख तबो ऊँचाई से डर लागेला. ई साला बिन माथा-गोड़ी के डर से जिंदगी परेशान बा. गईल रहनी राँकी-माऊटेंन पर स्‍कीईगं करे एक बेर फेर. सोचले रहे आदमी जे अबकी त साफ डर निकाल देवे के बा. एकदमजी-जान लगा के चढत गईनी एक लिफ्‍ट से दोसरा लिफ्‍ट पर - शुरु कईनी बिगिनर्स से आ ईंटरमिडियट ले जात जात बुझा गईल जे ई साला एतनाआसानी सेजाए वाला मर्ज ना हवे. २५ बेर से जादे बईठला के बाद भी साला जईसे लिफ्‍टके ऊँचाई २०-२५ फुट से ऊपर होखे हमार होश गायब होखल शुरु हो जाए. केतनाकोशिश कईनी मन के समझावे के लेकिन ई साला डर कहा जाला. पहिले भी कई बारकोशिश कईले बानी लड़े के लेकिन अब बिश्‍वास हो गईल बा जे ईलाज करावे केपड़ी. जिदंगी मे गर आदमी एक बेर चिड़ई खानी उड़ के ना देखलख तऽ का मजाभईल जियला के.

खैर, स्‍कीईंग तऽ जे भईल से भईल, मजा खूब आईल. बहुत दिन बाद मौका मिलल८-९ के ग्रुप मे बकवास करे के. जड़ीए से होस्‍टल मे रहला से आदत बिगड़गईल बा बडका-बडका ग्रुप मे ठठ्‍ठा करत आ अब वईसन जमात ना मिले त कबो-कबो कउचेला.

आजकल ईटली मे विंटर ओलपिंक चलऽता. देखनी कुच दिन पहिले जे आपन भारत से भी४ जना पहुँच गईल बाड़े. देख के एक मिनट खतिरा खुशी भईल लेकिन फेर दिमागजरे लागल. बहुत निराश कईले बा ई आपन देश. दिन रात बाहरा मे आदमी एक मौकाखोजत रहेला जे ई फिरंगीयन के सामने एक बेर देश के नाम पर माथा उठ जाये.सौभाग्‍य के बात हवे जे पाकिस्‍तान चाहे बांग्‍लादेश मे जनम ना भईल.

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