कहल जाला जे अंत भला तऽ सब भला. बढिया से गुजर गईल साल. जाते-जाते नानी माँ के भी ले गईल. दू साल से जादे ईंतजार कईली बेचारी बिछौना पर, बिना सुध-बुध के, पडल. नानी माँ पुरानका जमींदारी मानसिकता के रहली आ नयका जमाना मे हमेशा कुछ ना कुछ से खिन्न रहस, भगवान के घरे जरूर थोड़ा चैन मिली. लईकाही में ही हम चल गईनी नानी संगे रहे आ ऊहाँ से सीधे होस्टल. आज जब सोचऽतानी तऽ बुझाता जे आपन महतारी से जादे नानी के किस्सा याद बा. हमनीं के खेलत-कूदत अगर गिर जाईं सन तऽ नानी पहिले चेहरा देखस आ अगर चेहरा पे बारह बाजल देखाई देवे तब तऽ धरती के दू-चार लात लागे, लेकिन अगर जे देह पे चोट के निशान आ आँख मे लोर के निशान ना मिले, तऽ डाँट, चाहे कबो-कबो दू थोपी भी, गिरे वाला के सहे के परे. ई बात कौनो तरिका से हमार ममेरी बहिन के मालूम हो गईल रहे आ पूरा लईकाही हम एह बात से खिसियाईल रहनी जे हमरे काहे डाँट परे, गुड्डी के काहे ना. आजन्म वैष्णव, नानी माँ कईहो प्याज लहसुन ले ना खईली, लेकिन जब ले उनका ताकत रहे चौका मे बाकी सब केहू के तरकारी खतिरा पिआज उनके हाथ से कतराईल. नानीमाँ के हाथ के लिट्टी, भंटा के चोखा, मकई के पिठ्ठी, मालपुआ, तरुआ, टमाटर के भरुआ तरकारी ईत्यादी खात बने.
मात्र एक शिकायत रह गईल नानी से - बहुत बेकार नाम धर देहलू. बतावऽ तोहरा शायद अंदाजा ना रहे लेकिन कौनो बढिया, आसान नाम रहित त ई दोसर देश मे सब नाम के केवल पहिलका अक्षर से नानू बोलऽईतन सन. लेकिन जान लऽ जे तोहार देहल नाम हवे एही से ना बदलनी आज ले ना ही कईहो बदलेम, जिंदगी भर रह जायेम चिढत-कुढत. ईहो बात बा जे ई शपथ लिखाई के नाम पर लागू ना होखी - ऊ हमार आपन रही, माफ करिहा.
माता के भी माता रहलू,
लेकिन सबसे जादे तू ही करलू-
नाम देहलू, होश देखईलू,
चले-रहे के भी सिखईलू.
चलनी, रहनी, नाम बढईनी
तोहार ऋण से उऋण ना भईनी.
सादा जीवन, उच्च विचार,
अपना से आगे आपन परिवार -
जबले जिएम हमहूँ चलेम
देखावल कुछ रस्ता तोहार.