एक भोजपुरीया जवान की डायरी

ऊहाँ से ईहाँ तक के किस्‍सा कहानी

Monday, January 23, 2006

 
आज नेताजी के १०९वा जन्‍मदिन हवे. कुछ नेता रहले ऊहो. 'तुम मुझे खून दो, मैं तुम्‍हे आजादी दूँगा' के नारा से हम भले ही पूरा मेल ना बैठाईं लेकिन कहे वाला मरद रहे से तऽ ना नकारेम. आपन समाज के हाल अईसन हो गईल बा जे हमनी के लगे बहुत कमी बा मरद हीरो लोग के. अब कारण जि भी होखो, वस्‍तुस्‍थिति तऽ ईहे हवे जे हमनी के अधिकतर महान लोग (आदमी, भगवान नाही)बाहुबल से दूर जाके ही महान बनल बा. दरिद्रनारायण के उपासक समाज के ईहे शायद सबसे बड़ा खूबी आ सबसे बड़ा त्रासदी भी रहल बा. गाँधी, बुद्‍ध, तुलसीदास के एह देश मे जहाँ अशोक तक के नाम युद्‌ध से दूर भागला खतिरा लेहल जाला, एक अगुआ भईल जे देश खतिरा लड़े के सोचलख आ लड़लख भी. गाँधी बाब जे करलन से करलन - आजादी देवऽईलन, कुछ हद ले समाज सुधारलन आ थोड़-बहुत एक दिशा भी प्रदान कईले; लेकिन कहियो बापू के नाम सुन के सीना ना चौड़ा होखे - ई एगो अईसन सम्‍मान बा जे हर भारतीय सुभाष बोस आ भगत सिंह जईसन खतिरा ही रखेला. तीन गो कमीशन बईठल आ केतना तीन-पाँच बतकही भईल लेकिन आज ले सरकारी तौर पे पता ना चलल जे नेताजी कब आ कईसे मुअले. भारत-रत्‍न के सम्‍मान मे भी दागे लागल रह गईल.

खैर, हमरा ना उम्‍ंमीद बा जे अभी ले जीअत होखिहन. भगवान शांती दऽस वीर के आत्‍मा के. पुरनका नेता लोग के जन्‍मदिन आ पुण्‍यतिथी भी अपना मे एगो काम करबे करेला - याद देला देवेला जे एक समय ओईसनो रहे.आज के तऽ ई हाल बा जे, जौन काँग्रेस के एतना महान-महान लोग सींचलख ओकर अईसन हाल भईल बा जे का कहल जाओ. बताईं ना ई अधिवेशन चलता ससुरन के आ ई सब नेतवन सब मिल के एगो काल्‍ह के लवंडा के माला पहिनावऽ ताडे सन. बताईं जावाहर लाल के खानदान के बेटा हवे तऽ का ससुरा भगवान हो गईल. हद हो गईल साला बेशरमी आ चापलूसई के... जा हो जवाहर लाल... कईसन ई लड़ी लगईलऽ हो. ई साला हरामखोर मउगा नेतवन सब के देख के आपन मुड़ी कूच लेवे के मन करेला. साला हद हो गईल ई ता. जईहा चाचा केसरी के हटा के राजीव के मुसमात के सीदे अध्‍यक्ष बनऽईले तईहे माथा फोड़ लेहले रहनी हम तऽ; आज बुझाता जे थूक के डूबे के पड़ी.

Thursday, January 05, 2006

 
कहल जाला जे अंत भला तऽ सब भला. बढिया से गुजर गईल साल. जाते-जाते नानी माँ के भी ले गईल. दू साल से जादे ईंतजार कईली बेचारी बिछौना पर, बिना सुध-बुध के, पडल. नानी माँ पुरानका जमींदारी मानसिकता के रहली आ नयका जमाना मे हमेशा कुछ ना कुछ से खिन्‍न रहस, भगवान के घरे जरूर थोड़ा चैन मिली. लईकाही में ही हम चल गईनी नानी संगे रहे आ ऊहाँ से सीधे होस्‍टल. आज जब सोचऽतानी तऽ बुझाता जे आपन महतारी से जादे नानी के किस्‍सा याद बा. हमनीं के खेलत-कूदत अगर गिर जाईं सन तऽ नानी पहिले चेहरा देखस आ अगर चेहरा पे बारह बाजल देखाई देवे तब तऽ धरती के दू-चार लात लागे, लेकिन अगर जे देह पे चोट के निशान आ आँख मे लोर के निशान ना मिले, तऽ डाँट, चाहे कबो-कबो दू थोपी भी, गिरे वाला के सहे के परे. ई बात कौनो तरिका से हमार ममेरी बहिन के मालूम हो गईल रहे आ पूरा लईकाही हम एह बात से खिसियाईल रहनी जे हमरे काहे डाँट परे, गुड्‍डी के काहे ना. आजन्‍म वैष्‍णव, नानी माँ कईहो प्‍याज लहसुन ले ना खईली, लेकिन जब ले उनका ताकत रहे चौका मे बाकी सब केहू के तरकारी खतिरा पिआज उनके हाथ से कतराईल. नानीमाँ के हाथ के लिट्‍टी, भंटा के चोखा, मकई के पिठ्‍ठी, मालपुआ, तरुआ, टमाटर के भरुआ तरकारी ईत्‍यादी खात बने.

मात्र एक शिकायत रह गईल नानी से - बहुत बेकार नाम धर देहलू. बतावऽ तोहरा शायद अंदाजा ना रहे लेकिन कौनो बढिया, आसान नाम रहित त ई दोसर देश मे सब नाम के केवल पहिलका अक्षर से नानू बोलऽईतन सन. लेकिन जान लऽ जे तोहार देहल नाम हवे एही से ना बदलनी आज ले ना ही कईहो बदलेम, जिंदगी भर रह जायेम चिढत-कुढत. ईहो बात बा जे ई शपथ लिखाई के नाम पर लागू ना होखी - ऊ हमार आपन रही, माफ करिहा.


माता के भी माता रहलू,
लेकिन सबसे जादे तू ही करलू-
नाम देहलू, होश देखईलू,
चले-रहे के भी सिखईलू.
चलनी, रहनी, नाम बढईनी
तोहार ऋण से उऋण ना भईनी.
सादा जीवन, उच्च विचार,
अपना से आगे आपन परिवार -
जबले जिएम हमहूँ चलेम
देखावल कुछ रस्‍ता तोहार.

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