एक भोजपुरीया जवान की डायरी
ऊहाँ से ईहाँ तक के किस्सा कहानी
Saturday, October 29, 2005
बताईं ना एह दुनिया मे अईसन भी लोग बा जे साफ ना बूझे कुछ. अईसन साला हालत हो गईल बा आदमियता के . एक अनदेखा, अनजाना अंत के नाम पर एतना घटिया माध्यम. सबसे जादे दिल कचोटेला ई बात जे ई सब मे शक्ति के श्रोत आपन परवरदिगार ससुर बारें. हमार माँ तऽ ई पोस्ट नाहिए पढियें, सुनावल जाव कुछ साले भगवान के. आदमी के कुछो कहल तऽ देवार पर माथा फोड़ल हवे.
देखऽ हो पैगंबर ई का भईल
का बतईलऽ तू एह कमीनन के
जे एह हद तक बात चल गईल.
अरे दिअरी के बाजारे फेर कैगो दिया बुतल
फेर केतना मन टूटल, फेर मानवता घायल भईल,
आ एक बेर फेर हमार विश्वास फूटल जे
आदमी के बनावल भगवान आदमियता के ना भईल.
अरे ई कौन देवत्व भईल राम -
लौ के बदल देहलऽ लपट से,
पटाखा के बदले बम के भड़ाम.
बेकार शिक्षा देहला तू
देखऽ तऽ ई दहशत तमाम.
तोहरा बल पर, ई बेमतलब लड़ाई में
अईसन हिंजड़ा भईल ईंसान.
Wednesday, October 26, 2005
प्रजा के तंत्र तऽ अईसन टूटल, राजनीति नौटंकी हो गईल बा. केतना सप्ताह से हम हे अखबार, हो अखबार मे खोजऽतानी जे एगो नेता कहीं कौनो मुद्दा के बात करे. कौनो ससुरा के मतलब नईखे, लेकिन बात बा जे हम कौन बड़का आंदोलन छेड़ले बानी अपना स्तर पर. हा एगो काव्य-प्रयास भईल हऽ. भोजपुरी मे दूसरा कविता हवे ई.
दौड़ऽ हो भईया, दौड़ऽ हो चाचा
नेताजी अईलें.
नेताजी अईलें, सपना लईलें
ले अईलें वादों के हार.
हाथ जोड़िहें, मीठ बोलिहें
कहिहें सबकर मन के बात.
"सुन लऽ भईया, सुन लऽ बहिनी, सुन लऽ खोल के कान -
गईया भैंसी बैल बकरिया, बेढी कोला राम मडै़या, बीड़ी खैनी पान
चोरी-चुहाड़ी मारामारी, पट्टीदार के पट्टीदारी, खेत चाहे खलिहान.
बिना झिझक के दुख बतला दऽ; आपन मुश्िकल नोट करा दऽ.
नोट करा के स्िलप ले ली हऽ; भोट के दिन ले सजग से रहि हऽ.
ऊँख चूस के पानी मत पी हऽ; देख दाख के सड़क पर चलिहऽ.
अरे हेने ना सुनऽ हो बुढऊ, तू केने अईँकताड़ऽ पहलवान
मेहरारु लोग सुनऽ तारू ना आ तू का करऽताड़ऽ जवान
सोच समझ के भोट गिरईहऽ समय आज के बहुत अलग बा,
विकास प्रकाश तऽ बहुत सही बा, लेकिन मुद्दा ऊहे नाही बा.
प्रजातंत्र में, जान लऽ बाबू, केवल बहुमत के बतकही बा.
अब पूछबऽ तू हमरा से जे काहे,रोड के सोलिंग ना भईल बा ?
हम बोलेम जे जनता के गलती, हमरा मे ईहाँ कौन कमी बा.
जबले ना मिली पार्टी के बहुमत हमरा हाथ मे कुछ नाही बा.
नोट करऽ हो विद्यार्थी , आ तनी माईकवा तेज करऽ हो रहमान
प्रजातंत्र मे बहु के राज, एक के मतलब कुछ नाही बा.
का तू करबऽ से ना राजा, बाकी मे तोहार भाग धईल बा.
तोहनी के सेवक हम हरदम करेम तोहनी के भला के बात
तू ढेर खिसिअईबऽ तऽ ईहाँ से चुनबऽ कौनो बादुड़ छाप.
लेकिन ई जान लऽ सब लोगिन, हम कह देतानी साफ-साफ;
पूरा प्रदेश मे हवा बहऽता, बहुत ही जोर शोर से आज -
अबकी बार डिब्बा सरकार
डिब्बे के होई राज जान लऽ चली आवऽ हमरे साथ
डिब्बा पर गिरईबऽ या पछतईबऽ - फैसला बा तोहरे हाथ."
Monday, October 17, 2005
आजकल स्िथति कुछ अईसन भईल बा जे दुनिया में बहुत कुछ उल्टा-पुल्टा चल रहल बा. बताईं ना, वेटिकन शहर में ओझौति के पढाई शुरु भईल बा. पादरी लोग चोगा पहिन के शैतान पकडे़ के कला सिखऽताडे आ ईहाँ शैतान लंगटे नाचऽता बीच बाजारे.
काका बुश कुछ दिन पहिले फिलिस्तीनी अब्बास मस्तान के बतईलें जे उनका भगवान से संपर्क हो गईल बा. अब्बास लाल के रोकड़ा के जरूरत आ ईजरायली बंबू से बचाव चाहत रहे से ऊहो का बोलतन लेकिन दू थोपि लगावे के चाहत रहे. खाली लबड़ई के बाजार लगईले बा ससुरा. हम कहऽतानी जे रे लबड़ा अगर तें सही में भगवान से संपर्क बना लेले बारिस् तऽ आज ई तोहरा देश में ईवोल्यूशन आ क्रियेशन के का बतकहि होता? कचहरी बताई लईकन के अब जे वैज्ञानिक आ ग्रंथ में से कौन सांच बा!!
अब दोसरा के लबड़ई पर का हँसल जाए, ईहाँ तऽ आपन पतलून में ही बड़का-बड़का छेद बा. चुनावी माहौल गरमाईल बा अपना ईलाका मे आ नेतवन सब लागल होईहन सन जनता के ऊल्लू बनावे मे. यादव लल्लू,राम विलास आ नितिश के दंगल में जनता एक बेर फेर माटी फांकी. लेकिन का अफसोस कईल जाए; जनता में से जनार्दन तऽ कहिए निकल गईले. चोर आ चुहार जनता एक बेर फेर चोरन आ चुहारन के चुनिहें सन; आ एक बेर फेर से हम दूर से तमाशा देखेम आ बाकि सब केहू के गरिआयेम.
कोशिश करेनी जे जादे ना सोचीं एह सब विषय मे लेकिन का करीं, दिमाग भटक जाला. आजकल एतना समय बा काम पर कि दिमाग के व्यस्त रखल मुश्किल हो जाता; आ खाली रखला मे डर हो जाता वेटिकन से लौटत पादरीया सन से - हमार शैतानी अड्डा न ऊजाडे़ लागऽ सन.
Thursday, October 13, 2005
आसिन आ कातिक के महिना भोजपुरी-भाषी क्षेत्र मे आपन खास महत्व रखेला. नवरात्री के नौ दिन ले देवि के पूजा पाठ से अघा के दसवाँ दिन रावण के जरा के मरद-मेहरारू आ लईका लोग बीस दिन मे घर के साफ-सफाई लिपाई-पुताई कर के अमावस के राते पटाखा भड़का के छौ दिन मे ठेकुआ-टिकरी-पुआ पका सूरुज भगवान के डूबते आ उगते गोर लाग के ही आराम करेला. गाँव के मजा तऽ आसिन-कातिक चाहे फागुन मे ही बा. ना ढेर गरमी ना ढेर सरदी आ जबरदस्त मस्ती.
काल्ह घरे बात करत रहनी तऽ पता चलल जे एह साल भी रामलीला चलल रहे गाँव मे. गँवई रामलीला अपना मे रंगमंच के एक विशेष विधि हवे. भगवान राम के कहानी कौन बुढिया आ कौन लईका ना जानेला, ई तऽ तमाशा वाला मजा बा जे रामानंद सागर जी के नाटक मे ना मिली.
४-५ साल पहिले एक बेर मौका मिलल रहे दशहरा के समय घरे जाए के. खेला भी भईल आ बहुत रुचि से हम देखनि भी. मजा भी आईल. एगो मजेदार जोकर रहे मंडली मे - ससुरा कबो मंथरा बने तऽ कबो सुग्रीव आ रेघा रेघा बोले. एगो लवंडा भी रहे जे नकिया-नकिया आरती गावे रोज खेला शुरु होखे से पहिले आ सीता माता के रोल भी खेले. संतोष चौधुर के मुताबिक नवल बाबु के आँख रहे ओकरा पड़. संतोष चौधुर के बात मे केतना दम रहे से केहु ना जान पाई; खेला शुरु भईला के एक सप्ताह के भीतर ही लवंडा साहेब जोखु महतो के छोटकी लडकी के साथे निपाता हो गईलेन. ई काम हमरा अनुपस्िथति मे भईल; हम कुछ दिन खतिरा ममहर आ बहिनौरा मुरगा तोड़त रहनि. घूम-घाम के घरे अईनी तऽ, अनभिज्ञ, हम फेर गईनी रामलीला देखे. वोह दिन के नाटक रहे अशोक-वाटिका मे सीता - हनुमान मिलाप. सीता जी घोघ तान के बईठल रहली रावण के बगईचा मे आ हनुमान जी अईले. हनुमान जी बोलले 'माता' तऽ सीता जी चुप. सब देखनिहार लोग के बुझा गईल जे पीछे से बोलल जाता ' तुम कौन हो, वत्स' बोले के, लेकिन ई नयका सीता जी खिसिया गईली- एकाएक देखऽतानी जे घोघ फेक के जोकरवा रेघावता -
'का बकरी खानी मिमियाताडऽ, साफ-साफ बोलत काहे नईखऽ. लाँड पे पादी ई लवंडई, हमरा से ई घोघ तानल ना जाई'
हँसते-हँसते हमार पेट दुखाए लागल. रामलीला के मैनेजर साहब जल्दी से परदा गिरईलन लेकिन जोकरवा तऽ पाउच मारले रहे. परदा के खींच के हटईलख आ लागल दौड़े. जब ले लोग पकड़े, लंका दहन ला तैयार कईल मशाल ओकरा हाथ मे आ गईल रहे. अभी याद करला पर एतना हँसी आवता तऽ सोचीं कईसन भईल होई जब साड़ी पहिनले, घोड़ा खानि हुड़कत जोकरवा पुअरा के लंका मे आग लगईलख. मंदिर मे खेला होत रहे आ सड़क के पार स्कूल मे लंका बनल रहे. आग के लपट के ओज मे गाँव भर के लोग सड़क के एह पार से जोकर भाई के हाथ मे मशाल चमकावत चुपचाप देखलख आ मैनेजर साहेब आपन माथा पकड के पीछे मे बहिन-महतारी कईलन. पता चलल जे उनकर ही सुझाव रहे जोकर लाल के पाउच पकड़ावे के - का दो झिझक भागी.
रामलीला त़ऽ खैर डूबबे कईल, हम एगो सबक जरूर सिखनी -
अगर मसखरा के मेहरारु बनाई तऽ कम-से-कम पाऊच ना पकड़ाई.
Tuesday, October 11, 2005
कुलदेवता सोखा बाबा के कृपा से आज इहो काम भइल - टाइमपास कहीं चाहे 'पास में बहुत टाइम'. जमाना बहुत तेजी से आगे भाग रहल बा. नया नया किसिम के तौर तरिका देखले देखले पुरान हो जाता. कुकुर बिलाई खानी दिन रात चूसल हड्डी के पीछे भागत भागत दुनिया परेशान बा -जवान जवानी मे आ बुढऊ लोग दलानी मे. बड़ा दिक्कत बा.
लेकिन, हम आज एक कदम पीछे मारऽ तानी, भगौती के कृपा से. मोटा-मोटी पचीस साल पहिले, बसंत-पंचमी के दिन से, भट्टा छूके अभी ले लाखों लाईन लिखले होखेम हेने होने के भाषा मे; आपन मातृभाषा ने आज पहिला प्रयास बा. पचीस साल से जादे लाग गईल भाषा आ लिपि के मेल करावे मे. देर आयद दुरुस्त आयद. सरस्वती जी गवाह बाड़िन जे सब लक्ष्मी जी के खातिर भईल.
सरस्वती पूजा के परसादी ता अब कहिया मिलि कहिया ना राम जाने लेकिन देवि पर ध्यान पूरा बा. हाऽ, सरस्वती पूजा के बात से एगो किस्सा याद पड़ऽता -
नानाजी के छड़की के बाहर लईकन सब चंदा मांगत रहले सन. हम, सात -आठ साल के छवाड़िक, कोना मे खड़ा होके तामाशा देखत रहनी. एगो मास्टर-साहेब रोकईलें; मोटरसाइकल रोकलें आ तनि ताव से हिंदी में बोललें -
'हमारे सवाल का जबाब दोगे तुमलोग तभी चंदा मिलेगा.'
लईकन सब सोचते रहले सन जे पीछे वाला मास्टर-साहेब तड़ाक से पूछऽताड़े -
'If अगर But लेकिन What माने क्या'
अब बात रहे जे भले हि चंपारण के ऊ गाँव मे ई सबकर ना मालूम रहे, हमार होस्टलिया दिमाग मे ता ऊत्तर सेट रहे.
फटाक से कहनी -
'पूछनेवाला गदहा तो बताऊँ मैं क्या.'
मास्टर-साहेब के ता काटऽ ता खून ना. खिसिया के लागलन नाम पता पूछे. जब दू-चार गो मुँहफटवा बकले सन जे हम बहुत दूर पहाड़ पर पहाड़ा पढेनी ता मास्टर-साहेब अंग्रेजी मे शुरु हो गईले. नया-नया खून रहे आ हम कहाँ से कम रहनी - लाग गयनी जी-जान से हमहू. लईकवन सब खिखियाए लगलन सन आ माहटरन के मामिला तनि डोले लागल. हमहू जे पकड़नी रफ्तार तऽ रूके के नामे ना. अब का बोलनि आ कईसे बोलनी से ता नईखे याद, लेकिन मोटर-साइकल पर आगे वाला मास्टर-साहेब जे बात बोललन से आज ले याद बा -
'बबुओ, केतनो चिडई ऊडस आकाश, फेर अईंहे धरती के पास.'
आगे कहले जे,
'सब अंग्रेजी के टिटिर-बिटिर रह जाई धईल जे आपन समाज के तरिका ना आईल.'
बोले वाला सज्जन मास्टर रहबो कईले कि ना से नईखी कह सकत, वाकई बुद्धी देत रहले कि एहिंगे लाज पचावत रहले -से भी नईखी बोल सकत लेकिन ऊ 'मास्टर' सज्जन के बात अभी ले दिमाग में बा.
जान ला हो मास्टर-साहेब, ई डायरी तोहार मुखारविंद से मोटा-मोटी बीस-बाईस साल पहिले निकलल खखार के नाम करऽतानी. कौनो टिटिर-बिटिर ना होई अंग्रेजी मे ईहाँ.
Archives
October 2005
November 2005
December 2005
January 2006
February 2006
March 2006
