एक भोजपुरीया जवान की डायरी

ऊहाँ से ईहाँ तक के किस्‍सा कहानी

Monday, December 12, 2005

 
एक जना बाड़ें टूकी विलियम करके एह दुनिया मे. टूकी भाई अपना समय मे गबरू जवान रहले आ जवानी के जोश मे लास एंजेलेस मे एगो गैंग शुरु कईले ६० के दशक के अंत मे - क्रिप्‍स नाम से. आज के दिन मे ई दुनिया के सबसे बड़का गैंग बाटे- उत्‍तरी अमेरिका से लेकर के दक्षिणी अमेरिका आ दक्षिण अफ्रिका ले हजारो शाखा बाटे क्रिप्‍स के आज.

१९७९ के साले टूकी भाई पर चार गो खून के आरोप लागल आ मौत के सजा हो गईल. सजा लागला के बाद भी टूकी के आदत ना सुधरल आ एकाध बेर छूरी-चक्‍कू चलईले जेले मे, एक बेर फिरार होखे के भी कोशिश कईले लेकिन एको बेर आपन जुर्म ना सकारले.

जेल के कोठरी मे अकेले बईठल-बईठल अंतऽतोगत्‍वा कुछ बुद्‍धि आईल कि मन ऊब गईल, टूकी जवान के विरक्‍ति हो गईल. गैंग खतिरा माफी माँगले आ लागले लिखे लईकन के किताब. पढल-लिखल कौनो खास त रहले ना जे पंचतंत्र लिखते, लिखे लागले गैंग के विरोध मे. कुछ किताब लिखले कुछ पेपर लिखले आ कुछ एहिंगे भाँगले; एगो आत्‍मकथा भी निकाल देहले. लेखन मे तऽ ससुरा के अईसन कौनो बात नईखे, बहुत ताव से लिखेला आ लंबा चौड़ा शब्‍द डालेला लेकिन बात बा जे ईहा अज्ञेय जी के जेलगमन के बात नईखे होत. एकाध बात लेकिन हमरो बहुत बढिया लागल - जईसे एक जगह लईकन के कहता जे अगर जेल के अनुभूति करे के होखे त मात्र दस घंटा ला अपना के गुसलखाना मे अकेले बंद कर के देखे के.

खैर, धीरे-धीरे नाम फैलल आ एक साले एगो स्‍िवस नेता टूकी लाल के नाम नोबेल शांति पुरस्‍कार खतिरा भी डाल देहले. ओकरा बाद मे कम से कम पाँच बेर आऊरी नाम गईल ईनकर नोबेल खातिर, एक बेर साहित्‍य खतिरा भी; आ, एह बात से हमार जे ना सुलगे के चाही से सुलग जाला लेकिन टूकी बाबू के का दोश बा ओमे. समय आईल जे टूकी जेतना बड़ गैंग मे ना रहले ओकरा ले बड़ जेल मे हो गईले. एगो सिनेमा भी बनल हालीवुड मे. ग्रुप बन गईल जे ईनकर रिहाई के माँग करे लागल पहिले - कहनाम जे दोषी नईखे जवान; जे जूरी के लोग वर्ण-भेद कईलख; आ काथी काथी. सारा नियम-कानून आजमाईला के बाद लोग भिड़ल गवर्नर के लगे माफी खतिरा - जे जाए दीं, उमरकैद बना दीं, समय दीऽ नया सबूत मिलल बा त का का.

बुझात रहे जे ई जोकरवा स्‍वार्जनेग्‍गरवा माफी दे दी, लेकिन कुछ दिन ले लोग सब के घुमईला के बाद आज मना कर देहलख.

से बात ई हवे जे आज राती के टूकी पहलवान (ससुरा भिसंड बा देह दवासा से) के सुई देके मार देहल जाई.

हम सजाए-मौत के पक्षधर त ना हईं लेकिन लोग के मरला जियला से हमरा अईसन कौनो असर भी ना होखे लेकिन टूकिया के मरत देख के बहुत अजीब लागऽता. बताई कईसन ओ दिमाग मे लागत होखी - मरला ले आशा बाँधले टूकी साले के पचास खून के सजा तऽ उँहे लाग गईल. साले के सही सजा मिलऽता कि गलत से ना तऽ हमरा कौनो फड़क पड़ी, ना ही कुछो उखड़ी. लेकिन, मान ली जे कही ई नईखे खून कईले. बीसन साल के आदमी के सुधार कोर्ट के एक गलती के नईखे धो सकत. बहुत डर लागेला हमरा. साला जेतना बढिया सिस्‍टम बा उहा ओतने बड़ खतरा बा. एक बेर कही कुछ फिसलल जे टाँय-टाँय फिस्‍स.

Wednesday, December 07, 2005

 
अपना ईलाका मे आदमी के नाम आदमी से आगे बढेला. कारण जे भी होखे - नामील आदमी के अभाव चाहे नामील आदमी से लगाव. लईकाही से एक नाम सुनत आईल आदमी -गणितज्ञ वशिष्‍ठ नारायण सिंह के. जेतना सच ओकर दुगुना लबड़ई. हर दोसरा आदमी के लगे एगो थियोरी रहे उनका पर आ हमार विचार शुरु से कुछ अईसन रह गईल जे दुनिया के प्रति एक अलग तरह के अविश्‍वास हमेशा रहल.

खैर समय बदलल आ पहुँच गईनी अमेरिका. बईठल बईठल एक दिन ईंटरनेट पर खोजनी वशिष्‍ठ बाबू के नाम तऽ ईहो विश्‍वास हो गईल जे अमेरिका से PhD कईले रहलन UC Berkley से. बहुत दिन ले खोजला पर उनकर एक पेपर भी मिलल जे Pacific Journal of Mathematics मे १९७४ मे प्रकाशित भईल रहे.

"Reproducing kernels and operators with a cyclic vector. ( http://projecteuclid.org/Dienst/UI/1.0/Summarize/euclid.pjm/1102911984) " नाम से हमरा तऽ खैर कुछ खास ना चमकल लेकिन एक मित्र , जिन गणित मे PhD करत रहले, बतईले जे kernel functions के पढाई मे ई पेपर वाकई आपन स्‍थान रखेला. जेतना बतकही आदमी सुनले रहे सब पर विश्‍वास हो गईल जब एकाध साल पहिले Berkley के एगो जापानी विद्‍यार्थी आपन माथा पीट लेहलख जान के जे सनकल वशिष्‍ठ बाबू सड़ऽ ताड़े बिहार मे.

आज Bhojpuria.com पर उनकर बोली सुनके याद आ गईल. गर्व तऽ जरूर होखेला लेकिन मलाल भी रहेला जे अईसन प्रतिभा सबकर सामने बिखर गईल आ लोग खाली बतिआवते रह गईल. राज्‍य से अभी एक किशोर बा जेकरा से आशा बा कुछ लमहर कर के दिखावे के. तथागत तुलसी के नाम त खैर लोग जानते बा काम देखी कहा ले करेला ऊ लईका. http://physics.iisc.ernet.in/~tathagat/main.htm पर होमपेज हवे बालक के. बहुत ही सुशील आ विनम्र लईका बुझाता बतकही से. भगवान बचावस एह लईका के कौनो विघ्‍न- पीड़ा से. ले आव बबुओ नोबेल वगैरह कुछो. बहुत जरूरत बा एक दुनिया स्‍तर पर अव्‍वल बिहारी के.

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