एक भोजपुरीया जवान की डायरी

ऊहाँ से ईहाँ तक के किस्‍सा कहानी

Tuesday, November 29, 2005

 
शदाब भाई के टिप्‍पणी में आशावाद के बहुत सुंदर झलक दिखाई पड़ल. भाई, अगर राऊर सवाल हम सही समझनी तऽ बोलेम जे अगर ईहे चक्‍कर लागल रही तऽ देर हो जाई विकास भईला ले. कब ले जनता ई चोरवन सन के पाकिट भरत रही. बात तऽ सही ही बा जे जब लालू आईल रहले तब उनका से भी बहुत उम्‍मिद रहे; चलीं अब आशा कईल जाए जे नीतिश बेहूदा ना बनावस.

आजकल अमरीकि राजनीति मे भी बहुत ऊथल-पुथल मचल बा. काका बुश के दिक्‍कत हो गईल बा - लड़ाई रुकते नईखे आ हेने उनकर पार्टी के नेता लोग घूस खा-खा के मोटा गईल बा लोग. ओमे हांलांकि बहुत आश्‍चर्य के बात तऽ नईखे, आश्‍चर्य के बात त ई बा जे काल्‍ह एगो नेतवा मार लोर टपका टपका सकारलख जे लाखो डालर घूस लेहले बा. बताईं अपना देश मे कबो होखी.लेकिन तब बात बा जे ई तुलना भी बराबर के नईखे; एह बात के ईंहे छोड़ल जाव.

आजकल ईंहा के मौसम एतना मस्‍त भईल बा जे का कहल जाए. दक्षिणी कैलिफोर्निया के मौसम हमरा ख्‍याल मे दुनिया के सबसे अच्‍छा मौसम होखे के चाही. मैराथन के तैयारी चल रहल बा जोड़-शोर से. सोचले तऽ रहनी जे मार्च मे दौड़ लेहेम एगो लेकिन बुझाता जे कुछ समय और लागी. विचार बा जे जनवरी ले कम-से- कम आधा मैराथन दौड़ जाईल जाए. एक बेर दस माईल से जादे दूरी बढेला त़ शरीर मे अईसन अईसन जोड़ आ मसल के पता चलेला. जेतने छोट टुकड़ा होखी मसल के, साला ओतने दिक्‍कत करेला. आजकल हमरो एड़ी परेशान कईले बा- Achilles Tendonitis करके बोलेला.

मैराथन के बात से याद आवता पटना के किस्‍सा. एहसों होली मे गईनी तऽ अखबार मे फोटो देखनी दौड़ाक लोग के कुर्सी-टेबल लेकार भागत. मैराथन शुरु भईला के तीन घंटा के भीतर सारा कुर्सी-टेबल गायब रहे आ शायद एक भी दौड़ाक दौड़ मे ना बाचल रहे -- जय बिहार.

Tuesday, November 22, 2005

 
अलविदा लालू

पंद्रह साल ले बंबू कईलऽ;
जयप्रकाश के नाम डूबईलऽ;
जनता के टोपी पहिनईलऽ;
भेड़ बकरी के चारा खईलऽ;
कोर्ट मे लडलऽ भीतर भी गईलऽ;
मेहरारु के राज पकड़ईलऽ;
साड़न के रंगदार बनईलऽ;
घंटे खून, चौघंटे रेप आ छौ मे एक अपहरण करवईलऽ;
अराजकता के नंगा नाच नचवईलऽ;
त्राही-माम त्राही-माम मचवईलऽ.

राज्‍य के फेर भाग जाग गईल;
संतन के भखौती आज लाग गईल;
सुदंर अब अतिसुदंर भईल;
सरदारवा के भी शाषण गईल.
आशा के किरण फेर झिलमिलाईल;
धनिकन के जान मे जान आईल;
डाकदरन के चेहरा चकचकाईल;
लईकन के दिल मे खुशी समाईल;
माहटरन के फेर उम्‍मिद भर आईल;
चुहाड़न के दिल कस के धकधकाईल.

प्रजातंत्र के बलात्‍कारी,
जान ला तू यादव लल्‍लू -
हर कुकुर के दिन आवेला;
मौगो के भी लगन लागेला.
मसखरी करत कहँवा ले जईबऽ,
बिना नीति के राज भागेला.
केद्रं मे चंपई तेल लगावऽ;
मुसमात के जाघं के मैल छोड़ावऽ;
एक न एक दिन त जईबे करबऽ,
जेल मे तेल कड़वा लागेला.

Tuesday, November 15, 2005

 
एक से एक नौटंकी होखेला अपना क्षेत्र मे भी. खबर पढनी जे जेल पर हमला हो गईल रूसी क्रांति के बरखी के सुअवसर पर. गरीब-गुरबा ले लेहले बारे सन ताकत हाथ मे. एकरा से खुशी के कौन बात होई जे कमजोर सन के ताकत मिल जाए लेकिन ताकत बहुत खतरनाक चीज हवे अपना आप मे.

ढोआए ना सबसे ताकत के बोझा; खेत खोदत अकलू राम चाहे कलम चलावत गोनू ओझा.


खेत खोदत-खोदत अकलू ससुर के बुझाईल जे खेत उनकर हो गईल आ ऊ पहुँच गईले झटकल बेकाम, बेकरम, बेवकूफ आ जींस- कुरता तानले नया-नया क्रांतिकारीयन के लगे; जींस वाला नेता के जनता के ताकत मिलल आ फटही पहिनले जनता के नेता के ताकत मिलल. मिल के दूनो बंदूक ले अईले सन आ सामाजिक न्‍याय के खेला शुरु हो गईल. एक तरफ कामचोरी आ अशिक्षा के अईसन आलम बा जे ससुर अकलू के बुद्‍धि-विद्‍या से कौनो मतलब नईखे; दूसरा तरफ प्रजातंत्र के अईसन छूट बा आ जिंदगी मे अईसन शून्‍य बा जे ई साले पढल-लिखल बैल ससुर लोग ईक्‍किसवीं सदी मे रूसी क्रांति के वर्षगाँठ मनावता. रे बेहूदा सन, जाके तनी रूस के हालत देखऽ सन रे. साला ओकरो से जादे नाकाम कौनो प्रयोग भईल होई कहियो. ई धंधा हो गईल बा साला लोग के. दिमाग से कौनो वास्‍ता नईखे आ ससुर लोग दिमाग लगावता आज.

कैगो campus मे देखनी जे सबसे बेकार आ घूमल विचारधारा वाला सब communist बनेले सन. गरीबी खत्‍म करी ससुर लोग - देखऽ लोगिन नेपाल के हालत. जे चुतियन के बंदूक आ बम किने के पैसा बा आ चलावे खतिरा लोग बा, ओ कमीनन के दिमाग मे ई काहे ना घूसे जे ढंग से चलावल जाए त केतना कल्‍याण के काम होई ओह पैसा से. बताईं ना ई अईसन प्रजाति बा जे भिखारीयन के खुशहाली चाहऽता बिना पूंजीपति के सहयोग से. ..

धन सहेजल कौनो पाप नाही, अर्धम के कौनो साथ नाही
दरिद्र मे नारायण जरूर बसेले, लेकिन खलिया जमीन पर भात नाही
पेट भरी बुद्‍धि-विद्‍या से, घोड़ा दबावत हाथ नाही
ई पढ-लिख के मताईल साढँन से बचीहऽ, गुमराह बाडे़ सन, होशियार नाही.

Sunday, November 06, 2005

 

अपना ईहाँ के समय से आज छठ के सांझिया घाट होई. छठ के त्‍योहार से हमार आपन कुछ खास लगाव नईखे रहल, कारण कि ढेर मौका नईखे मिलल मनावे के, लेकिन छठ के नाम से लईकाही के कुछ बहुत ही खास स्‍मृति ताजा हो जाला.
बहुत बचपन से ही हम ननीहाल मे रहनी. नानी के गांव चंपारण मे बूढी गंडक के किनारे बा. आ भादो ले आराम से बाढ के पानी पचा के डकार लेहला के बाद, आसिन-कातिक के त्‍योहारी सिलसिला के अंतिम कड़ी मे, जे नदी के शोभा लागेला छठ के बिहनईया घाट से त अभी ले दिमाग मे अंकित बा. जईहा देखनी आ जियनी उ मजा तईहा त ओतना होश ना रहे लेकिन ओह आँख से देखल कुछ-कुछ अभी भी एक मतलब दे देवेला - मातल आँखे नदी के कछार पर चलत पानी मे सूरुज के पहिला किरण के चमक से मन मे जे मस्‍ती उकसल रहे, शायद ऊहे श्रोत हवे अनगिनत रतजगा के गंगा से प्रशांत किनारे. भीड़ के हमार पहिला अनुभूति भी छठ के घाटे ही भईल बा. एकरा अलावे छठ के ही घाटे शायद हमार आदमी के सनक से भी पहिला परिचय हवे. याद आवेला लोग के साष्‍टाङ्‍ग रास्‍ता नापल, भखौती रखेला. एगो जवान, जे अभी ले बुढा गईल होईहे, के दिमाग मे चित्र घूमेला - बहुत श्रद्‍धा से हम जवान के फूटल केहुनी आ घुटना निहारले रहनी एक साले; आदमी के हर अजीबोगरीब सनक के प्रति एक विशेष appreciation के भी जड़ हम ऊँहे देखऽ तानी.
एह सब के अलावा छठ के ठेकुआ-टीकरी-कसाड़-पुआ भी याद पड़ऽता सोचऽतानी त. नानी के हाथ के बनावल मीट्‍ठा वाला ठेकुआ त अब खाली बाते मे रह जाई. बेचारी नानी अब का खीअईहन, २-३ साल से त यमराज के ईंतजारी मे बेचारी पड़ल बाड़िन. भेजऽ हो छठी मईया, भेजऽ यमदूतन के नानी घरे एह साल. केतना दुख सही बुढाईल शरीर.


Tuesday, November 01, 2005

 
दिअरी के शुभकामना सब केहू के. हमार आपन त का दिवाली आ का छठ. घर-परिवार आ मित्रगण के शुभकामना देके ही मन अघा जाला. बाकी ढेर कुछ मिलबो ना करी खोजलो पर.

अगर हमार बात केहू माने त हम बोलेम जे सबकार कम से कम पाँच साल प्रवासी के जिंदगी जीए के चाही.दिवाली के दिया के Halloween के अंहार (Halloween के सांझे हमेशा घर के बत्ती बंद रखे के पड़ेला काहे कि हर साल भुला जानी लईकन खतिरा लेमनचूस खरीदे के)से आ तरुआ के जापानी तेमपुरा (Tempura) से बदले के मजा ही कुछ और हवे.

एह दिवाली लक्ष्‍मी जी थोड़ा प्रसन्‍न नईखी बुझात. पिछले सप्‍ताह जुआखोरी के सबसे बड़ा अड्‍डा - लास वेगास - मे पाकिट कटा गईल. साला चोर-चुहार भी जगह के हिसाब से बदले ले सन. बेतिया-मोतिहारी मे कटाईल रहित त पईसा निकालते सन आ मस्‍त रहते सन; दिल्‍ली मे ढेर कौनो खिसीआईत त दू-चार जगह क्रेडिट कार्ड चलावे के कोशिश करते सन; लेकिन ई लास 'एकरी $%^ & #$*' वेगास हवे. पाकिटमार भी छँटल बारे सन. ७-८ घंटा मे ही पूरा बैंक के आ दू-दू गो क्रेडिट-कार्ड के एकाऊंट खाली. अईसन सफाई से काम भईल बा जे बैंक वाला जासूस लोग के बुझात ही नईखे जे का भईल. खैर,

बाकी, ईहाँ लईकन के परिक्षा आवता SAT के आ आधा से जादे के कौनो अंदाज ही नईखे. अमरीकि स्‍कूल थोड़ा अलग तरिका से चलेले सन आ पढाई पर अपना ईहाँ अईसन जोर ना रहेला हाई स्‍कूल ले कम से कम. तीन महिना से जादे से बगल के एगो स्‍कूल मे SAT खतिरा गणित के क्‍लास पढावत बानी. पाँच दिन मे परिक्षा बा आ आज ले आधा से ज्‍यादा क्‍लास बिना कलम चाहे कागज के आवेला. गणित पढावल थोड़ा मुश्‍किल हो जाला जब तीन चौथाई के परिक्षा के नाम भी ठीक से मालूम ना होखे. एगो जवान बा - आन्‍हर मे काना राजा लेकिन जौना क्‍लास मे पाँच गो विद्‌यार्थी के ई नाम ना मालूम होखी, ई लईका नोबेल पुरस्‍कार जीते के ईच्‍छा रखेला. मेहनती हवे आ के जाने ला जीत भी सकऽता. सब सोच के खेल हवे. ई बहुत बड़ा अंतर देखेनी हेने के आ अपना ओरी के मानसिकता मे - लोग ईहाँ सोच पे लगाम ना लगावे कठिनाई के डर चाहे ख्‍याल से.

अभी लागल होई जमावड़ा जुआ पर अपना ओरी , ठ्‍ठा लागत होई, गिलास भरात होई, तेल रगड़ के केतना लोग चोरी के कैरियर के शुरुआत करत होखी, बम पटाखा ताबड़-तोड़ फूटत होखी, बहुत मजा होखी.... अच्‍छा कहियो फेर हमरो मिली. हा हा पुरान प्रवासी चुटकुला हवे.

Archives

October 2005   November 2005   December 2005   January 2006   February 2006   March 2006  

This page is powered by Blogger. Isn't yours?